
मंदिर-मस्जिद बहुत बना लिए,
अब दिल में एक घर बनाना है।
जाति-धर्म की दीवारें छोड़,
इंसान को इंसान बनाना है।
भूखे को रोटी मिल जाए,
प्यासे को पानी मिल जाए।
गिरते हुए किसी हाथ को
बस सहारा मिल जाए।
किसी की आँख में आँसू हों,
तो अपना सुख थोड़ा बाँट दें।
किसी के जीवन में अँधेरा हो,
तो बनकर दीपक साथ दें।
न ऊँचा कोई, न नीचा कोई,
सबमें एक ही प्राण है।
ममता, करुणा, प्रेम जहाँ हो,
वहीं सच्चा भगवान है।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र











