
जब साँसों की डोर
धीरे-धीरे ढलने लगेगी,
जब आँखों के आगे
ज़िंदगी की तस्वीर बदलने लगेगी।
तब न धन याद आएगा,
न कोई पद, न पहचान,
बस याद आएँगे वे चेहरे,
जिनसे जुड़ा था अपना जहान।
कुछ बातें होंगी अधूरी,
कुछ रिश्ते होंगे अनकहे,
कुछ आँसू पलकों पर ठहरे,
कुछ शब्द रह जाएँगे अनसुने।
ज़िंदगी तो चली जाएगी,
पर एक सवाल छोड़ जाएगी—
हमने कितना जिया था,
और कितना बस निभाया था?
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र











