
लम्हा थम गया जब माँ ने बेटी को गले लगाया,
सदियों की जुदाई एक पल में ही पिघल गई।
लब खामोश रहे, आँखें ही सब कह गईं,
माँ की ममता के आगे हर दूरी संवर गई।
वो बचपन की हँसी, वो आँगन की खुशबू,
बेटी के आँसुओं में फिर से उतर गई।
माँ ने आँचल से जब उसकी नमी पोंछी,
तो लगे जैसे फिर से वही लोरी लौट गई।
बेटी पराई होकर भी पराई नहीं लगती,
माँ के सीने में आज भी वहीं बसती है।
दुनिया चाहे कह दे वो ससुराल चली गई,
पर माँ की आँखों में वो आज भी हँसती है।
कितने सावन बीते, कितनी होली गुज़री,
पर माँ ने हर त्यौहार पर उसे ही याद किया।
बेटी के बिना आँगन सूना-सूना लगता था,
आज बेटी लौटी तो घर में उजाला हो गया।
गले लगते ही माँ का सारा दर्द बह गया,
बेटी की सिसकी में माँ का कलेजा कह गया।
इन दोनों के बिना तो जीवन भी अधूरा रह गया,
माँ बेटी का रिश्ता ही सबसे सच्चा रह गया।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला अमन सनातनी
सावनेर नागपुर महाराष्ट्र











