
विधा : पद्य
क्या अनुपम प्राकृतिक छटा है ,
नभ तल सुंदरता से ही पटा है ।
दिख रहा जैसे दूर ही कहीं से ,
आपस में ही कटा और बॅंटा है ।।
व्योम हुआ लाल नीला व पीला ,
धरा पर हरी हरियाली छाई है ।
छाई है नवजवानी इस धरा को ,
जैसे धरती ने ली अंगड़ाई है ।।
हो रही शाम ये धरा पर धीरे ,
जैसे भास्कर की ही बिदाई है ।
जा रहे रवि अब अस्ताचल में ,
निशा ने भू को ही सहलाई है ।।
उषा छाई अब निशा में ही जैसे ,
फूट पड़ी अस्ताचल की लाली ।
फसलों से धरा हुई है सुनहली ,
प्यार से ये झुक रही हो डाली ।।
कैसी तेरी यह मनमोहक रंग ,
कैसी छटा तूने यह बनाई है ।
कहीं रंग विरंगी बनाई दुनिया ,
कहीं पर काली घटा छाई है ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।











