
दुनियां की भीड़ में रहती हूं पर अकेली हूं
कहने को तो सारे रिश्ते हैं पर मैं अकेली हूं
तलाश है मुझे बस और बस उन अपनों की
काश, कोई कहे-“तुम परेशान मत हो, हम हैं ना।”
यह दुनियां मतलब की हो गई है
कौन है अपना ,कौन है पराया
सामने में सभी हंसते -बोलते हैं पर पीछे हंसी उड़ाते हैं
मोबाइल फोन में सैकड़ो नंबर सेव
हैं फिर भी दिल की बात किससे कहूं?
किसके कंधे पर सिर रख सकूं? अपनी व्यथा सुना सकूं? जो मुझे समझ सके
फिर भी हमारा तलाश जारी है
एक सच्चे दिल रखने वालों की तलाश है
जो बिना किसी मतलब के पूछ ले,”बता दोस्त, आज क्यों उदास है?”
वही दोस्त असल में अपना है बाकी सब तो दिखावा करने वाले हैं
तलाश अपनों की है पर क्या बताऊं?
दिल आज भी अकेला है
डॉ मीना कुमारी परिहार











