
अब भज मन सीताराम, मनुज तन पाया।
यह जीवन है अनमोल, यूँ ही गँवाया।।
माया के इस जाल में, क्यों मन लुभाया।
छूटेगा सब एक दिन, क्या संग आया।।
लोभ-मोह के जाल में, खुद को फँसाया।
राम-नाम का अमृत पी, क्यों न अपनाया।।
क्षणभंगुर संसार है, सत्य समझाया।
साँस-साँस में हरि-नाम, सभी ने गाया।।
दुख-सुख के इस फेर में, जीव घबराया।
राम-भजन से हर क्षण, सुख-शांति पाया।।
मात-पिता का मान रख, धर्म निभाया।
सेवा में ही जीवन का, सच्चा फल पाया।।
भूल न जाना मूल को, जग ने बहकाया।
सीताराम का नाम, भव-सागर तराया।।
अंत समय जब आएगा, क्या याद रह पाया।
राम-स्मरण ही साथ, यही सार बताया।।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













