
दिनाँक- 08-10-2026
विषय- समय का सदुपयोग
विधा- पद्य
1- धरती पर मानव बड़ा, बुद्धिमान लो जान।
सब विकार उसमें रमे, गहराई पहचान।
गहराई पहचान, समय से कारज कीजे।
दिनचर्या हो अगर, व्यवस्थित न दु:ख लीजे।
कटें सकल जंजाल, सकल श्रुतियाँ ये कहती।
न हो आलस हृदय, यही कर्मों की धरती।।
2- सुख की हो बरसात नित, करो समय का ध्यान।
समय-समय पर काम सब, कीजे उर सुख मान।।
कीजे उस सुख मान, गाँठ सब दु:ख की टूटें।
स्वजन, पडोसी दें अशीष, परिजन न छूटें।।
कहें जुगल कविराय, जुगुत मानो हरिये दु:ख।
समय लिया पहचान, लहे वो जीवन में सुख।।
3- पावन ऋतुएँ देश है, पावन हैं नर-नारि।
वृक्ष, फूल-फल हैं सभी, पावन चले वयारि।।
पावन चले वयारि, समय से तारे घूमें।
सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, धरती को चूमें।
करो समय का ध्यान, सभी ऋतुओं में सावन।
महकेगा त्योहार, रहे जीवन यह पावन।।
पं० जुगल किशोर त्रिपाठी (साहित्यकार)
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी ( उ०प्र०)













