
विषय : सोच
विधा : पद्य
सोच सोच सोच तू मानव ,
खूब समझ बूझ तू सोच ।
हर जीवों का कर तू भला ,
या दीनों को ही तू नोच ।।
समझता स्वयं महाबली है ,
समय से है बलवान नहीं ।
समय को जो पहचान ले ,
वैसे तुम हो महान नहीं ।।
समय ही है गज पे चढ़ाता ,
समय नीचे उतरवाता है ।
हाथी पर ही चलते चलते ,
कुत्ते से भी कटवाता है ।।
समय से पूर्व ही सोच ले ,
समय से पूर्व कर तुलना ।
मंजिल हेतु है आगे बढ़ना ,
या ख्वाबों में है झुलना ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।













