
खिंच दो लकीर संस्कार की फिर न कभी साहित्य सीता का हरण हो !
पेदा करो हर श्रोता के दिल मे भाव मर्यादा के मंच से’ दिल से जुदा बदनियती रावण हो !
प्रश्न हो खडा हमारे सामने नारी कि अस्मिता का उसका किया जाये राम बनकर हल !
पाप का हिरण छुपकर न बेठ पाये मन मे हो न पाये फिर लक्ष्मण रेखा के साथ छल !
क्यो आते हम मंचो पे क्या दिया हमने समाज को अपने शब्द भाव चिन्तन से !
कविताओ कि हत्या कि साजिष रची नहीं क्या हमने कागज के टुकडो कि खातिर क्या दिया हमने वक्त को चुटकलो के किर्तन से !
सिर्फ लफ्फाजी से ही घर चलाने हमे अपने तो लेकर डुगडुगी हाथ मे सडक पे हम मजमा क्यो नही लगाते !
अरे भाई लक्ष्मी ही लक्ष्य हे हमारा तो फिर मां शारदे कि तस्विर रख मंचो पे मां शारदे कि लाप्टर के तमाशे से हंसवाहिनी कि साखपे बट्टा क्यो लगाते !













