
जो शून्य है, वही सत्य है,
उसका न रूप है, न नाम है,
जहाँ काल का भी अंत है,
वही आदि धाम प्रारंभ है।
न सृष्टि थी, न दृष्टि थी,
न चेतना की वृष्टि थी,
एक मौन में सब मौन था, वह प्रारंभ ही
सृजन का, पहला अनूठा मौन था।
फिर शक्ति जागी स्वयं में,
एक स्पंदन हुआ उस मौन में।
जो था छुपा गहरे कहीं,
वह आ गया आकार में।
उस एक परम प्रकाश का,
प्रारम्भ इस संसार में।
आदि वही है, जो सदा से है,
प्रारम्भ उसकी अभिव्यक्ति है।
आदि यदि शिव का ध्यान है,
प्रारम्भ शक्ति की शक्ति है।
आदित्य हर अंत में छुपा नया सवेरा है,
जहाँ खत्म दुनिया, वहाँ प्रभु का डेरा है।
जिसे अंत समझते हो इस जीवन का,
वो तो अनंत की ओर बढ़ता, नया प्रारम्भ है।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्या वाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ












