
रब जाने जिंदगी के सफर की इंतिहा क्या होगी
या तो कट जायेगा या खत्म यहाँ होगी
सिला जीने का मेरे मालिक क्या चुकाना होगा
जमीर से जाऊँ या जहाँ से जाना होगा
रजामंदी जीवन का अब एक दस्तूर बन गया
जीने का नाफरमान सबब बन गया
क्या मरने का ही असल नाम जीना है
दिल पत्थर दिमाग बंद बस गम पीना है
करम नसीब का धोखा ही जीवन का पैमाना है
रंज सिला क्या करें किससे करें सब बेजा फँसाना है
सुनवाई इस दरबार में ए बदनसीब मयस्सर नहीं है
मनचाही किस्मत जहाँ के रोजे में तसव्वुर नहीं है
जी रहे कि वो जी रहे है तलबगार खुदा कसम कोई नहीं है
फ़र्ज़ ईमान की सलाहियत है इबादतगार कोई नहीं है
जीवन है मायूषी का खेल है
खेलने का ही बस रेलमपेल है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












