
ये रिश्ते-नाते भी
बदलाव की हवा के झोंको से
दरकते हैं
जो कभी लेते थे
तेरे आंचल की छांव में सांस
वक्त आता है
वो भी बदलते हैं
आसमां की ऊंचाईयों में
उड़ान भरने को
उड़ पड़ते हैं
घोंसला तो तुम्हारे दम पे आबाद
इसे यूं ही न होने दो बर्बाद
बीता कल तो
सभी को रहता है याद
भूले भटके
उन परिंदों को भी
आ जाती है याद
भर लेते हैं
पंख फैला कर
वो भी कभी-कभी परवाज ।
हे पंछी !
तेरे पंखों में …अब वो दम नहीं
जो था कल….वो नहीं आज
तूं जी अपनी जिंदगी
उन संग
जो आ कर
तुझे लगा लेते आवाज
ये रब का है दस्तूर
सब कुछ बदलता है
तूं मत सोच…. अपने चले गए हैं दूर
तूं अपने दम… जी जिंदगी
आवाज लगाने वाले बहुत हैं… वक्त नहीं है क्रूर
अभी भी जिंदगी में बहुत कुछ है
वो रब … आस-पास ही तो है
वक्त पे … आएगा जरूर।
– महेश शर्मा– करनाल













