
अन्जाने
दुश्मन ने मेरा
जीना दूभर किया हुआ है
मेरे मन का
एक विरोधी
मेरे भीतर छुपा हुआ है
जब आशा के
अंकुर फूटे
कुतर गयीं सब आशंकायें
भीतर
साँप-नेवले लड़ते
खुद ही खुद से बैर निभाएं
ऊपर ऊपर
निर्भयता है
भीतर कोई डरा हुआ है
मेरी
हार-निराशाओं पर
मुझमें ही ये कौन हँस गया
बीच नदी
मेरे काँटे में
मेरा ही प्रतिबिंब फँस गया
थक कर सोयी
हुई देह में
कौन निरंतर जगा हुआ है
खुद से खुद की
चर्चा बहसें
सारे निर्णय पड़े निलंबित
सही गलत के
असमंजस में
खुद ही खुद से हैं प्रतिबंधित
साबुत तन के
भीतर कोई
टुकड़ा टुकड़ा बँटा हुआ है
के वी













