
एक बात बोलूं साहेब,बचपन में जब एक पिता के हाथों से एक रूपया भी मिलता था
अगर किसी भी बच्चे को तो वह बच्चा बहुत खुश होता था और जमींन से ऊपर
नीचे उछलने लगता था और अपनी खुशी ऐसे बयान करता था उस एक रूपया को
लेकर जैसे एक लाख मिल गया हो लेकिन आज के समय में वह बच्चा लाख रूपया
भी कमा कर खुश नहीं हैं मालूम है क्यों क्योंकि वह पैसा एक मजबूर पिता का था
जो खुशी अन गिनत देता था लेकिन आज खुद के कमाए पैसे में वो खुशी बिल्कुल भी
नहीं है क्योंकि एक रुपया कि कीमत आज एक लाख रूपया भी नहीं है।
चन्दे पासवान उर्फ अलबेला जी मधुबनी बिहार से,













