
ज़हर-सी बातों का असर हवाओं पर नहीं रहा,
ओस भी अब शफ़्फ़ाफ़ अपने आँचलों में नहीं रहा।
शहर–शहर धूप बदनाम होकर फिरती है आज,
किरणों का वह सख़्त पहरा बस्तियों पर नहीं रहा।
दरिया उफानों में डूबा, तोड़ आया अपने तट,
अब उसे भी ख़ुद से निस्बत-ए-लम्हा नहीं रहा।
रात भी किस हक़ से दावा करे अंधेरों का,
जबके दिन ही अपनी रोशनी में ज़िंदा नहीं रहा।
समंदर से गहरा हुआ इन्सानी चेहरों का छल,
सच कहूँ—चेहरों में अब चेहरों जैसा चेहरा नहीं रहा।
बातों के महीन जाल में अक़्सर कैद होता सच,
सांस लेता था जो पहले, अब वो ज़िंदा नहीं रहा।
लोग अपनी वाक्-चालाकियों में इतने डूब गए,
कि सच का हर्फ़ भी अब उन तक पहुँचा नहीं रहा।
लॉस्टम के लफ़्ज़ों में भी सन्नाटा है इन दिनों,
वो शहरों-सा रौशन दर्द अब दिल पर नहीं रहा।
आर एस लॉस्टम












