
व्यक्ति को, आध्यात्मिक ज्ञान की ओर ,
गीता ही ,ले जाती है।
जीवन के दुखों, भय और व्यर्थ चिंता से,
गीता ही,मुक्ति दिलाती है ।
भगवद्गीता कर्म ,भक्ति और ज्ञान का ,
अनुसरण सिखाती है।
भौतिक ईच्छा और आसक्तियों से,
मानव को ,ऊपर उठाती है।
कठिन हों डगर यदि, गोविंद की शरण से ,
सहज सरल बन जाते हैं ।
गीता के, अनुसरण मात्र से ही मानव ,
संशय मुक्त हो जाते हैं ।
मन का, वश में न होना व्यक्ति के,
पतन का कारण बन जाता है।
कृष्ण कहते,जो मन नियंत्रित हो जाए तो ,
सुलक्ष्य प्राप्त हो जाता है।
भौतिक मोह में, लिप्त जो हुए तो,
आत्मा का विनाश निश्चित है।
ईश्वर पर विश्वास रखने वाली आत्मा ही,
नरक के द्वार से वंचित है।
निष्काम कर्म भावना ,से केवल मानव ,
धर्मयुक्त कर्तव्य करें ।
कर्मयोग में आसक्त न होकर ,
जीवन को परमानंद से भरे।।
कृष्ण कह गए पार्थ से परिवर्तनशील जीवन है ,
सुख दुःख तो आते जाते हैं ।
घबराना नहीं किसी परिस्थिति में ,
भगवद्गीता के सार यही बतलाते हैं ।
श्रीमती अंजना दिलीप दास
बसना (छत्तीसगढ़)












