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पंचतत्त्व में बसे भगवान

धरती जैसी मजबूती हो, मन में शांति रहे,
नम्र बने व्यवहार हमारा, किसी से बैर न रहे।
हर दर्द को मुस्कान बना दे, सेवा हो आधार,
धरती कहे, सेवा में ही मिलता ईश्वर का संसार।

आकाश जैसा बड़ा दिल हो, न हो कोई दीवार,
न द्वेष रहे, न क्रोध रहे, बस प्रेम का ही व्यवहार।
ऊँचे विचार और साफ मन में झलके सच्चा प्रकाश,
आकाश कहे — ईश्वर असीम, वही सबका विश्वास।

हवा जैसी हल्की साँसें, जिसमें जीवन छिपा है,
वो न दिखती, पर साथ रहे, हर पल अंदर रहती है।
शांत हवाओं को स्पर्श करे, मन का बोझ उतार,
वायु कहे — ईश्वर पास, हर सांस में उनका प्यार।

अग्नि जैसा उजला सच हो, जो अंधेरा दूर करे,
अहंकार और झूठ पिघलें, मन सच्चाई में भरे।
दीप जले तो राह मिले, दिल हो साफ और पार,
अग्नि कहे, सत्य में ही है ईश्वर का असली रूपहार।

पानी जैसा निर्मल मन हो, जिसमें न छल-कपट,
प्रेम की धारा बहती जाए, न आए कोई रुकावट।
दया, करुणा और कोमलता हो जीवन का आधार,
नीर कहे — जहाँ प्रेम हो, वहीं ईश्वर का अवतार।

धरती-सा धैर्य अपनाओ, आकाश जैसा विश्वास,
हवा-सा हल्का जीना सीखो, अग्नि-सा सच्चा प्रकाश।
जल जैसा निर्मल दिल रखो, छोड़ो झूठ-अहंकार,
ऐसे मन में खिलता है — ईश्वर का प्यारा संसार।

प्रकृति रोज़ कहती हमसे — “तू अकेला नहीं,”
पत्ते, नदी, परवत सबमें ईश्वर की झलक यहीं।
जो दिल से सुन ले प्रकृति को, मिट जाए अज्ञान,
ऐसे हृदय में जन्मे फिर — साक्षात भगवान।

जब मन में न रहे नफरत और दिल में हो प्यार,
जब सत्य और करुणा बन जाएं रोज़ का व्यवहार।
जब अहंकार मिट जाए और हो मन शांत-विचार,
तब आत्मा कहती धीरे — “ईश्वर हैं मेरे साथ अपार।”

ईश्वर न सिर्फ मंदिर में, न शब्दों में, न आसमान,
उन्हें ढूँढो अपने भीतर — वो हैं दिल में विद्यमान।
जो बाहर खोजते रहते, वो रह जाते अनजान,
जो भीतर झाँकें प्रेम से — पाए दिव्य भगवान।

पांच तत्वों में बसते हैं — धरती, आकाश, हवा,
अग्नि की रोशनी और पानी — यही ईश्वर की छाँव।
जहाँ प्रेम, सत्य और दया हो — वहीं परम स्थान,
ईश्वर धीरे कहता है — “मैं यहीं हूँ, मेरे इंसान।”

योगेश गहतोड़ी “यश”

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