
श्रीमती शोभा शर्मा जी का काव्य-संग्रह ‘प्रणय धारा’ प्रेम, समर्पण, विरह, वेदना और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा सुरम्य प्रवाह है, जो पाठक के हृदय में उतरकर भीतर तक एक मधुर स्पंदन जगा देता है। प्रस्तावना में व्यक्त उनके विचार प्रेम को किसी बंधन, किसी परिभाषा या किसी एक सीमा में बाँधने से इनकार करते हैं—और यही व्यापकता उनकी रचनाओं का मर्म बन जाती है। प्रेम को वे केवल संबंध नहीं, बल्कि आत्मा की कंपन, मन का उजास और जीवन का वह आधार मानती हैं, जो हर जीव में निरंतर स्पंदित रहता है।
उनकी कविताओं में भाव और भाषा का अद्भुत संतुलन है—सरलता में भी सौंदर्य, और सौंदर्य में भी गहराई। यह संग्रह प्रेम की विविध अवस्थाओं को जिस कोमलता और संवेदनशीलता से उकेरता है, वह पाठक को अपने अनुभवों के आईने में झाँकने के लिए विवश करता है। शोभा जी की अभिव्यक्ति में मधुर दुख का स्पर्श, क्षणिक सुख का आलोक, और अनंत आशा की धूप—सब एक साथ बहती दिखाई देते हैं।
काव्य-संग्रह की कई रचनाएँ प्रेम के बदलते रंगों और मन की अनकही छटाओं को गहन आत्मीयता से रूपायित करती हैं। जैसे ‘प्रेम की परिभाषा’ में प्रेम का तत्व-दर्शन है, तो ‘इश्क़ का जादू’ में भावनाओं की सहज उन्मुक्तता। कहीं ‘दिल ही तो है’ की मासूम स्वीकारोक्ति है, तो कहीं ‘तेरे मेरे ख्वाब मनचले’ की मनोहर चंचलता। कुछ रचनाएँ जैसे ‘फागुन’ और ‘तुम्हें हमसे डर न हो’ ऋतु-आधारित अनुभूतियों के सहारे प्रेम की रंगीनियों को विस्तार देती हैं। वहीं ‘नादान दिल’ और ‘याद’ में मन का अकेलापन, प्रतीक्षा और स्मृति की पीड़ा एक मर्मस्पर्शी रूप में सामने आती है।
इन शीर्षकों का प्रयोग पूरे संग्रह में जिस तरह अर्थपूर्णता से उभरता है, वह स्पष्ट करता है कि शोभा जी केवल लिखती नहीं, बल्कि अनुभवों को शब्दों में पिरोती हैं। उनकी रचनाएँ क्षणिक भाव-विस्फोट नहीं, बल्कि उस गहरी अनुभूति का परिणाम हैं, जो मन में देर तक गूँजती रहती है।
कवयित्री का शिल्प स्वच्छ, भावपूर्ण और प्रवाहमय है। वे अनावश्यक अलंकरण से बचती हैं और अपने शब्दों को प्राकृतिक सरलता से खिलने देती हैं। इसलिए उनकी कविताएँ पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि पाठक स्वयं प्रेम के उस अनंत प्रदेश में विचरण कर रहा है, जहाँ हर मोड़ पर कोई नई अनुभूति प्रतीक्षा में खड़ी है।
‘प्रणय धारा’ का सबसे बड़ा गुण इसकी सत्यता है—प्रेम यहाँ केवल विजय नहीं, बल्कि हार, समर्पण, प्रतीक्षा, मौन और विछोह—हर रूप में स्वीकृत है। इस संग्रह की संवेदनाएँ पाठक के हृदय में देर तक सजीव बनी रहती हैं। शोभा शर्मा जी ने जिस आत्मिक भावभूमि से इन रचनाओं को जन्म दिया है, वह उन्हें विशिष्ट बनाती है।
निःसंदेह ‘प्रणय धारा’ हिन्दी काव्य-जगत में प्रेम-कविता की परंपरा को एक नया विस्तार देती है। यह केवल पढ़ी जाने वाली पुस्तक नहीं, बल्कि अनुभूत की जाने वाली भावयात्रा है—जो पाठक के मन में मधुर संगीत की तरह गूँजती रहती है।
समीक्षा प्रयास :- पवनेश मिश्र छतरपुर मप्र, कल्पकथा साहित्य संस्था परिवार












