
अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा: क्लेशा: ।
अविद्यास्मिताराग द्वेषाभिनिवेशा:= अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश {ये पाँचों}; क्लेशा:= क्लेश हैं ।
अनुवाद– अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँचों क्लेश हैं ।
व्याख्या– ये क्लेश पाँच हैं– जिनको क्षीण किए जाने से ही मन में स्थिरता आती है ।
ये ही क्लेश जीव मात्र के संसार चक्र में बार-बार आने का कारण बनते हैं तथा महा दु:खदायक होते हैं ।
संसार में अन्य भी प्रकार अनेक प्रकार के दुख हैं किंतु उन सब का मूल यह पाँच ही हैं इसलिए इन्हें क्रिया योग द्वारा क्षीण किए जाने से मन स्थिर होता है ।
ये पाँच क्लेश हैं– अविद्या अस्मिता, राग द्वेष और अभिनिवेश । ये क्लेश अहंकार की ही उपज है ।
यह अविद्या जो संसार की ओर प्रवृत्त करती है उसके मूल में ही अहंकार ही है अस्मिता {मैं हूं} का भान भी अहंकार के कारण है ।
राग-द्वेष भी अहंकार की ही उपज है तथा अभिनिवेश {मरण-भय} भी अहंकार ही है क्योंकि शरीर की मृत्यु कोई मृत्यु नहीं है वह चोला है जिसे फटने पर बदल जाता है किन्तु मरता अहंकार है ।
जीने की इच्छा भी अहंकार के कारण है इसलिए मृत्यु का भय इस अहंकार पर चोट करता है कि अब सब कुछ छीना जा रहा है ।
इसलिए ये सभी क्लेश अहंकार के ही कारण हैं ।
अहंकार ने अविद्या को जन्म दिया तथा अविद्या के रहते ये अन्य चारों क्लेश जीवित रही रहेंगे ही ।
वह {सूत्र ४} में बताया गया है ।
जिस प्रकार ज्वर आने पर शरीर के ताप का बढ़ना सिरदर्द, बेचैनी, घबराहट, भूख न लगना, अरुचि, शरीर दर्द आदि हो जाते हैं तथा ज्वर के उतरने पर सब अपने आप ठीक हो जाता है ।
उसी प्रकार इन पाँचों क्लेशों के मिटने से अन्य सभी दुख मिट जाते हैं । प्रत्येक दु:ख को अलग-अलग मिटाना नहीं पड़ता ।
अन्य सभी दुख इन्हीं पाँचों की ही उपज हैं ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
साधक~ बलराम शरण शुक्ल












