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साधन पाद सूत्र– ४

अविद्या क्षेत्रमूत्तरेषां प्रसुप्ततनु विच्छिन्नोदाराणाम् ।

अविद्या= अविद्या है; क्षेत्रम्= कारण; उत्तरेषाम्= जिसका वर्णन {तीसरे सूत्र में} अविद्या के बाद किया गया है, उन {अस्मितादि चारों क्लेशों} का; प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्= जो प्रसुप्त, तनु, विक्षिप्त और उदार– {इस प्रकार चार} अवस्थाओं में {वर्तमान} रहने वाले हैं ।

अनुवाद– प्रसुप्त, शिथिल, दबे हुए और कार्य प्रवृत्ति अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश क्लेशों की उत्पत्ति भूमि ‘अविद्या’ है ।

व्याख्या– सूत्र तीन में जो पाँच क्लेश बताए गए हैं । उनमें अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश इन चारों क्लेशों का कारण अविद्या है ।
इसलिए जब तक अविद्या जीवित है इन क्लेशों को मिटाने का कोई उपाय नहीं है किंतु अविद्या के नाश से इन सब का नाश हो जाता है ।
{अविद्या का स्वरूप सूत्र ५ में बताया गया है} ।
यह चारों क्लेश अविद्या के रहते सदा जीवित रहेंगे ही, चाहे वह प्रसुप्त तनु {शिथिल} विच्छिन्न {दबे हुए} तथा उदार {कार्य प्रवृत्ति} किसी भी अवस्था में रहें । चित्त में उपस्थित रहते हुए भी जिस समय जो क्लेश कार्य नहीं करता उसे ‘प्रसुप्त’ कहते हैं । प्रलय काल तथा सुषुप्ति में ये चारों प्रसुप्त करते हैं । दूसरी ‘तनु’ अवस्था है । योग साधना द्वारा जब इनके प्रभाव को क्षीण कर दिया जाता है जिससे ये अपना प्रभाव कम कर देते हैं । यह हीन शक्ति वाले क्लेश ‘तनु’ कहलाते हैं । तीसरी अवस्था ‘विच्छिन्न’ है। जब कोई ‘क्लेश’ अधिक सक्रिय हो जाता है तो दूसरा अपने आप दब जाता है । चौथी अवस्था ‘उदार’ है । इसमें क्लेश अपना कार्य पूर्णतया कर रहा होता है, वह पूर्ण सक्रिय होता है । अविद्या के रहते चारों क्लेश इन चार अवस्थाओं में से किसी में भी हों जीवित अवश्य रहते हैं । इसलिए इसके नाश का उपाय अविद्या के नाश से ही हो सकता है ।
बालक में ये क्लेश ‘प्रसुप्त’ रहते हैं । साधक में ‘तनु’ {सूक्ष्म} हो जाते हैं ।

राग के समय द्वेष ‘विच्छिन्न’ हो जाता है । तथा द्वेष के समय राग ‘विच्छिन्न’ हो जाता है । जब एक के तीव्र होने पर दूसरा ना दबे उसे उदार कहते हैं ।

{आगे के सूत्रों में इन पाँचों क्लेशों की व्याख्या की गई है} ।

स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
पं. बलराम शरण शुक्ला हरिद्वार

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