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भावपल्लवन — (संवेदना, साहस, विश्वास और सद्वृत्ति)

श्लोक:
संवेदना आत्मनैक्यं साहसं हृदयेऽभयम्।
विश्वासो मनसि संकल्पः सद्वृत्तिस्तनुशौकृतम्।।

यह श्लोक मूल रूप से वेदों में शब्दशः उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसका भाव और शैली पूरी तरह वैदिक और उपनिषदिक ज्ञान से प्रेरित हैं। इसमें बताए गए चारों गुण “संवेदना, साहस, विश्वास और सद्वृत्ति” वेदों और उपनिषदों में सिखाए गए मानव-धर्म, सत्य, निर्भयता, संकल्प-शक्ति और सत्कर्म की मूल शिक्षाओं को सरल रूप में एक साथ समझाते हैं। “आत्मनैक्य” यानी सबमें एक आत्मा का भाव बृहदारण्यक उपनिषद से जुड़ा है; “अभय” यानी निर्भयता कठोपनिषद की शिक्षा है; “संकल्प” की जड़ें छान्दोग्य उपनिषद में हैं और “सद्वृत्ति” यानी अच्छे कर्म यजुर्वेद के सिद्धांतों से संबंधित हैं। इसलिए यह श्लोक वेद का सीधा उद्धरण नहीं है, बल्कि वेद–उपनिषदों के सार को छोटा, स्पष्ट और सूत्ररूप में प्रस्तुत करता है तथा मानव-जीवन के चारों हिस्सों आत्मा, हृदय, मन और शरीर को एकीकृत कर एक समग्र जीवन-दर्शन देता है।

मानव-जीवन अनेक आयामों और अनगिनित अनुभूतियों का गहरा संगम है। जन्म से लेकर अंतिम श्वास तक मनुष्य संसार के रंगों को न केवल देखता है, बल्कि उन्हें आत्मा, मन और शरीर के अनेक स्तरों पर जीता भी है। कोई भी जीवन केवल बाहरी घटनाओं का प्रवाह नहीं होता; इसके भीतर एक सूक्ष्म अंतर्लय निरंतर स्पंदित रहती है। यही सूक्ष्मता मनुष्य को संवेदनशील बनाती है, भय पर विजय दिलाती है, विश्वास का बीज बोती है और उसे श्रेष्ठ कर्म की ओर प्रेरित करती है। इसी अंतर्लय को यह श्लोक सुंदरता से उद्घाटित करता है—

संवेदना आत्मनैक्यं — संवेदना वह शक्ति है जो आत्मा में एकत्व का अनुभव कराती है।
साहसं हृदयेऽभयम् — साहस वह भाव है जो हृदय में निर्भयता जगाता है।
विश्वासो मनसि संकल्पः — विश्वास मन में अचल संकल्प बनकर उदित होता है।
सद्वृत्तिस्तनुशौकृतम् — सद्वृत्ति शरीर को श्रेष्ठ कर्मों में सुशोभित करती है।

यह श्लोक मनुष्य के चार आयामों—आत्मा, हृदय, मन और शरीर को एक सूत्र में पिरोकर जीवन का पूर्ण दर्शन प्रस्तुत करता है।

१. संवेदना — आत्मा का एकत्वबोध

संवेदना केवल किसी घटना या अनुभूति के प्रति प्रतिक्रिया नहीं है; यह वह आंतरिक शक्ति है जो मनुष्य को विश्व से जोड़ती है। जिस क्षण संवेदना विकसित होती है, उसी क्षण मनुष्य अपने छोटे-से ‘मैं’ से ऊपर उठकर सबमें अपने अस्तित्व को पहचानने लगता है। आत्मा मूलतः एकत्व का स्रोत है; उसमें विभेद का कोई स्थान नहीं। यह एकत्वबोध मन में तभी जागृत होता है जब संवेदना परिपक्व होती है।

संवेदना का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि यह देखने की दृष्टि बदल देती है। जहां अभाव था, वहां करुणा आती है; जहां विरोध था, वहां समझ का प्रकाश फैल जाता है। संवेदना अहं को पिघला देती है और आत्मा के शुद्ध प्रकाश को आगे ले आती है। जैसे सुबह सूर्य की किरणें हिमखंड को पिघला देती हैं, वैसे ही संवेदना मनुष्य की कठोरता को पिघलाकर उसे मानवता से भर देती है।

संवेदना वह पुल है जो एक आत्मा को दूसरी आत्मा से जोड़ता है। यह व्यक्ति को अकेलापन नहीं रहने देती; वह हर जीव में, हर ध्वनि में, हर अनुभूति में स्वयं का अंश देखने लगता है — चिड़ियों की चहचहाहट, वृक्षों की आहट, बूढ़े हाथों की थरथराहट और बच्चे की खिलखिलाहट सब उसके अपने बन जाते हैं। यही “आत्मनैक्य” सबमें एकत्व का अनुभव जो संवेदना का मूल स्वरूप है।

जब संवेदना जागती है, तब जीवन केवल व्यक्तिगत संघर्षों की कथा नहीं रहता; वह समाज, प्रकृति और समस्त प्राणियों के साथ जुड़कर एक गहरा आध्यात्मिक संबंध बन जाता है।

२. साहस — हृदय की निर्भयता

साहस केवल युद्ध का शब्द नहीं, बल्कि हृदय का वह तेज है जिसमें भय का अंधकार टिक नहीं पाता। भय मनुष्य को अदृश्य बंधनों की तरह जकड़ लेता है, कभी असफलता का भय, कभी समाज का, कभी मृत्यु का। साहस इन सब बंधनों को तोड़कर हृदय को मुक्त करता है।

साहस वह अग्नि है जो भय के हिमखंड को गर्म कर पिघला देती है और वही जल जीवन की धारा बन जाता है। संवेदना ही साहस का आधार है, क्योंकि संवेदनशीलता हृदय को कोमल बनाती है और कोमलता ही सच्चे साहस को जन्म देती है। कठोरता साहस नहीं, अहंकार है; जबकि संवेदनशील साहस निर्मल, शांत और आत्मोत्सर्गमय होता है।

साहस सिखाता है कि जीवन केवल भय से बचकर नहीं जिया जा सकता; उसे पूर्णता से जीने के लिए उसके जोखिमों को स्वीकार करना पड़ता है। यह वह मौन शक्ति है जो कठिन समय में कहती है—
“तुम अकेले नहीं, सत्य तुम्हारे साथ है।”

३. विश्वास — मन का अटल संकल्प

मन स्वभाव से चंचल है; क्षण में हर्ष, क्षण में विषाद, कभी निर्णय, कभी संशय होता है। इस अस्थिरता को स्थिर करने वाली शक्ति विश्वास है। विश्वास मन को स्पष्ट दिशा देता है और उसके भीतर दृढ़ संकल्प जगाता है।

यदि साहस हृदय का दीप है, तो विश्वास मन की ज्योति है। यह ज्योति भीतर के अंधकारों को शांत करती है। विश्वास असंभव को संभव बनाता है, क्योंकि विश्वास मन को ऊर्जा देता है, संकल्प को स्थिर करता है और व्यक्ति को अपने मार्ग पर टिकाए रखता है।

विश्वास कहता है—
“कठिनाई है, पर असंभव नहीं।
अंधेरा है, पर प्रकाश निकट है।
संघर्ष है, पर सफलता निश्चित है।”

विश्वास मनुष्य को धैर्य, संयम और दिशा प्रदान करता है। यही विश्वास जीवन को स्थिर और सार्थक बनाता है।

४. सद्वृत्ति — शरीर का श्रेष्ठ कर्म

जब संवेदना आत्मा को पवित्र करती है, साहस हृदय को मजबूत बनाता है और विश्वास मन को स्थिर करता है; तब इन तीनों का प्राकृतिक फल सद्वृत्ति के रूप में प्रकट होता है। सद्वृत्ति का अर्थ केवल नैतिकता नहीं, बल्कि कर्म की वह सुंदरता है जिसमें पवित्रता, नम्रता और कल्याण का भाव समाहित होता है।

शरीर कर्म का साधन है। आत्मा अनुभव करती है, मन सोचता है, हृदय प्रेरित करता है; पर कर्म शरीर ही करता है। सद्वृत्ति शरीर को कर्म की पवित्रता देती है—

  • सेवा में विनम्रता,
  • वाणी में मधुरता,
  • संबंधों में सौहार्द,
  • और समाज के प्रति करुणा।

सद्वृत्ति से युक्त व्यक्ति जहाँ जाता है, वहाँ प्रकाश, शांति और प्रेरणा का वातावरण उत्पन्न होता है। ऐसे कर्म यश या लाभ के लिए नहीं, बल्कि कर्तव्य की पवित्रता से किए जाते हैं। यही गीता का कर्मयोग है।

५. चारों गुणों का एकत्व — पूर्ण जीवन का सार

इन चारों गुणों को अलग न समझें; वे एक ही जीवन-वृक्ष की चार अवस्थाएँ हैं—
संवेदना → साहस → विश्वास → सद्वृत्ति

  • संवेदना जड़ है।
  • साहस तना है।
  • विश्वास शाखाएँ हैं।
  • सद्वृत्ति फल-फूल हैं।

जहां संवेदना नहीं, वहां साहस कठोर बन जाता है।
जहां साहस नहीं, वहां विश्वास डगमगा जाता है।
जहां विश्वास नहीं, वहां सद्वृत्ति टिक नहीं पाती।
और जहां सद्वृत्ति नहीं, वहां जीवन अधूरा रह जाता है।

यह श्लोक इन चारों की एकता को जीवन के पूर्ण दर्शन के रूप में प्रस्तुत करता है।

६. निष्कर्ष — जीवन का समग्र दर्शन

संवेदना आत्मा को सृष्टि से जोड़ती है,
साहस हृदय को भय से मुक्त करता है,
विश्वास मन को स्थिरता देता है,
और सद्वृत्ति शरीर को श्रेष्ठ कर्मों की दिशा देती है।

इन चारों का संगम ही मनुष्य को पूर्ण मनुष्य बनाता है; जो केवल जीवित नहीं रहता, बल्कि जगत को आलोकित करता है।

आज के युग में जहां संवेदना घट रही है, साहस टूट रहा है, विश्वास कमजोर हो रहा है और सद्वृत्ति कम होती जा रही है, यह श्लोक स्मरण कराता है कि मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य उसके गुणों में है, बाहरी उपलब्धियों में नहीं है।

जो संवेदनशील है, वही सच्चा साहसी है।
जो साहसी है, वही विश्वासयोग्य है।
जो विश्वासयोग्य है, वही सद्वृत्ति का साधक है।
और जो सद्वृत्ति का साधक है, वही जीवन-यज्ञ का पूर्ण कर्ता है।

योगेश गहतोड़ी “यश”

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