
चाँद चाँद है, मगर उसका आसमान कहाँ है,
रोशन तो है रात, पर तेरी पहचान कहाँ है।
हवा भी तेज़ है, मगर तेरी महक नहीं लाती,
ये दिल तो धड़क रहा है, पर उसमें जान कहाँ है।
सितारे पूछते हैं, तेरी ख़बर क्यों नहीं मिलती,
मैं कहूँ क्या उनसे—मेरी रातों का मेहमान कहाँ है।
तू चला गया तो उजाला भी जैसे गुम हो गया,
चाँद तो है ऊपर, मगर मेरा जहान कहाँ है।
तेरी राहों में बिछे थे मेरी नींदों के धागे,
आज उनींदा सा हूँ—मेरी कोई शाम कहाँ है।
मोहब्बत में खो गया, बस तेरा नाम रह गया,
मैं हूँ भी अगर, तो मेरा अब गुमान कहाँ है।
आर एस लॉस्टम












