भागती हुई जिन्दगी से कुछ वक्त निकालना है,
थाम कर खुद को कुछ ठहराव लाना है,
धुंधली हुई जो आँखें छवि तेरी दिखा कर चमकना है,
थामकर जो अंगुली चले उन लरजती हेथलियो को चूमना है,
बरसों बीत गए उन गलियों से गुजरे अब फिर से उन्हें रोशन
करना है,
देख कर आइने में खुद को थोड़ा संवरना है,
वक्त नहीं रुकता किसी के लिए बस वक्त को साथ लेकर चलना है,
कुछ बाते जो रह गई अधूरी उन्हें अब अल्फ़ाज़ देना है,
ख्वाब जो आंखों की पलकों पर ही ठहर गए अब हौसलों की उड़ान भरना है,
बंद हो गई ख्वाहिशें जो चार दिवारी में अब नीले गगन तले ले जाना हैं,
याद नहीं कब साथ बैठ निवाले लिए थे अब परिवार के साथ कुछ कौर मुंह में लेने हैं,
भागती हुई जिन्दगी से कुछ वक्त निकालना है।।
विद्या बाहेती महेश्वरी राजस्थान












