
इश्क़ ने इश्क़ से, इश्क़ में कहा,
मैं इश्क़ हूँ — तेरे इश्क़ में मुझे क्या मिला?
बस दर्द की राहें, तन्हाइयों का सिलसिला,
तू मुस्कुराया भी तो — मैं ही आँसू बना।
मेरी चाहतों के दीप बुझते चले गए,
तेरी नज़रों में मेरा क्या क़द्र रहा?
मैं हर धड़कन में तेरी तस्वीर ढूँढता रहा,
तू पूछता रहा ये तड़प किस लिए कहा?
मैं टूटकर भी तेरा नाम ही लिखता रहा,
तू ख़ामोशियों में मुझसे फ़ासला बनता रहा।
मुझे लगा था इश्क़ में रोशनी भी मिलेगी,
पर हर मोड़ पर बस अंधेरों का क़िला मिला।
तूने चाहा भी तो शायद बस एक पल को,
मैंने तो उम्र भर तुझमें ख़ुद को पिघला दिया।
अब पूछता हूँ तेरी महफ़िल में मेरा क्या था?
मैंने सब कुछ दिया, बदले में क्या मिला?
आर एस लॉस्टम












