
अनित्यशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ।
अनित्याशुचिदुःखनाथात्मसु= अनित्य, अपवित्र, दुःख और अनात्मा में; नित्यशुचिसुखात्मख्याति:= नित्य, पवित्र, सुख और आत्मभाव की अनुभूति; अविद्या= ‘अविद्या’ है ।
अनुवाद– अनित्य, अपवित्र, दु:ख और अनात्मा में नित्य पवित्र, सुख और आत्म भाव की प्रतीति- अविद्या है ।
व्याख्या– इस सूत्र में ‘अविद्या’ की व्याख्या की गई है कि इस सृष्टि में जो नित्य है शाश्वत है, पवित्र है, सुख देने वाली है, आनन्द देने वाली है, सदा शान्ति प्रदान करने वाली है ऐसी आत्मा जो निज का स्वभाव है उसका ज्ञान ही ‘विद्या’ है ।
इसके विपरीत यह संसार, शरीर, मन, इन्द्रियाँ, आपसी सम्बन्ध, नाते, रिश्ते, धन, दौलत, मान, सम्मान, आदि अनित्य है, सदा रहने वाले नहीं है । ये सभी इस जीवन से सम्बन्धित हैं । मृत्यु के बाद ये सभी छूट जाएंगे, उनकी स्मृति भी नहीं रहेगी जिस प्रकार स्वप्न टूटने पर मनुष्य का स्वप्न का सारा विलास छूट जाता है ।
किन्तु मनुष्य इस सांसारिक अनित्य पदार्थों को ही नित्य, अपवित्र को पवित्र, दु:ख देने वाले होते हुए भी उनमें क्षणिक सुख का आभास होने से इसमें सुख तथा इन सम्पूर्ण अनात्म प्रकृति में आत्मा की प्रतीति करना ही ‘अविद्या’ है ।
यद्यपि विद्या और अविद्या दोनों ही माया हैं, प्रकृति हैं किन्तु विद्या आत्मज्ञान की ओर ले जाने वाली है । जिससे परम सुख व शान्ति मिलती है जबकि अविद्या संसार में भटकने वाली है, जिससे दु:ख, संताप आदि बढ़ते हैं तथा जन्म मृत्यु का चक्र बना रहता है । इसलिए यह क्लेश माना गया है । इस अविद्या का मूल कारण अहंकार है । यह अविद्या ही मूल क्लेश है जो अन्य क्लेशों का कारण है ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
साधक : बलराम शरण शुक्ल हरिद्वार












