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डगमगाता मनोबल


डगमगाता मनोबल, टूटते हौसले लिए
मैं हर सुबह खुद से फिर लड़ने निकल पड़ता हूँ।
उम्मीद की झड़ी में भीगता हूँ चुपचाप,
जहाँ डर भी अब सवाल पूछना भूल गया है।

बे-खौफ मौत दर वाज़े पर खड़ी रहती है,
और ज़िंदगी आँख मिलाकर मुस्कुरा देती है।
मैं गिरता हूँ, मगर गिरने को हार नहीं मानता,
क्योंकि हर टूटन में एक नई ज़िद पलती है।

यह रास्ता आसान नहीं, पर मेरा है,
और शायद इसी ज़िद का नाम — ज़िंदा होना है।
कभी थककर साँसें भी मुझसे सवाल करती हैं,
“कब तक?” — पर दिल चुपचाप आगे बढ़ जाता है।

भीड़ के शोर में भी खुद को थामे रखता हूँ,
क्योंकि भीतर कोई आवाज़ अब भी मुझे बुलाती है।
हर रात खुद को थोड़ा खोकर सोता हूँ,
और हर सुबह कुछ ज़्यादा पाकर जाग जाता हूँ।

ज़ख़्म अब डराते नहीं, सबक बन चुके हैं,
और अँधेरे भी मुझे रास्ता दिखाने लगे हैं।
अगर यही संघर्ष है ज़िंदगी की पहचान,
तो हाँ — मैं इसे पूरी शिद्दत से जी रहा हूँ।
आर एस लॉस्टम

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