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पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक का नाम: प्रियदर्शिनी (आत्मिक अभिव्यक्ति : भावों की सच्चाई)

लेखिका: प्रो. आशा पंकज मूंदड़ा

समीक्षक: डॉ. विपुल कुमार भवालिया

(लेखक, कवि, शिक्षाविद्, प्रेरक वक्ता, सह-संस्थापक – श्रमण पब्लिकेशन), अलवर (राजस्थान)

  1. भूमिका : समकालीन हिंदी कविता का संवेदनात्मक परिदृश्य

हिंदी साहित्य की काव्य-परंपरा भावात्मक अभिव्यक्ति से आगे बढ़कर सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक चेतना का सशक्त माध्यम रही है। आदिकाल की वीरगाथाओं से लेकर भक्तिकाल की आत्मानुभूति, रीतिकाल की सौंदर्य-संवेदना और आधुनिक काल की वैचारिक चेतना तक कविता ने मनुष्य के अंतर्मन को निरंतर स्वर दिया है। समकालीन हिंदी कविता इस परंपरा का ही विस्तारित रूप है, जहाँ निजी अनुभूतियाँ सामाजिक यथार्थ से जुड़कर व्यापक अर्थ ग्रहण करती हैं।

इसी संदर्भ में प्रियदर्शिनी (आत्मिक अभिव्यक्ति : भावों की सच्चाई) एक ऐसी कृति के रूप में सामने आती है, जो आत्मानुभूति, स्त्री-संवेदना, मानवीय करुणा और आध्यात्मिक चेतना को समग्रता में प्रस्तुत करती है। यह संग्रह न केवल कवयित्री की रचनात्मक परिपक्वता का प्रमाण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कविता आज भी मनुष्य को भीतर से संस्कारित करने की क्षमता रखती है।

यह कृति पाठक को भावुक नहीं बनाती, बल्कि संवेदनशील बनाती है; यह उसे पलायन की ओर नहीं ले जाती, बल्कि यथार्थ से मानवीय दृष्टि से साक्षात्कार कराती है।

  1. शीर्षक की दार्शनिक और काव्यात्मक सार्थकता

प्रियदर्शिनी—यह शब्द स्वयं में गहन अर्थ-छाया समेटे हुए है। ‘प्रिय’ अर्थात् जो हृदय के निकट हो, और ‘दर्शिनी’ अर्थात् देखने-दिखाने वाली। इस प्रकार ‘प्रियदर्शिनी’ एक ऐसी दृष्टि का संकेत है, जो जीवन को प्रेम, करुणा और सौंदर्य के माध्यम से देखती है।

‘आत्मिक अभिव्यक्ति : भावों की सच्चाई’ शीर्षक का उपशीर्षक इस कृति को और अधिक गहराई प्रदान करता है। यहाँ ‘आत्मिक’ शब्द कविता को केवल बाह्य अनुभूतियों तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि उसे आत्मबोध के स्तर तक ले जाता है। ‘भावों की सच्चाई’ यह संकेत देती है कि कविताएँ बनावटी सौंदर्य या कृत्रिम भावुकता से मुक्त हैं।

शीर्षक अपने आप में इस संग्रह की वैचारिक घोषणा है—यह भावों की सजावट नहीं, उनकी सच्ची प्रस्तुति है।

  1. काव्य-संग्रह की संरचना और विषय-विस्तार

यह काव्य-संग्रह विषयवस्तु की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध और बहुआयामी है। इसमें कवयित्री के अनुभवों का विस्तार केवल निजी जीवन तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय सरोकारों तक फैला हुआ है।

(क) स्त्री-संवेदना : आत्मबोध से आत्मगौरव तक

इस संग्रह का सबसे सशक्त पक्ष इसकी स्त्री-संवेदना है। यहाँ स्त्री-

केवल पीड़िता नहीं,

केवल सहनशील नहीं,

बल्कि सजग, प्रश्नकर्ता और आत्मनिर्भर व्यक्तित्व है।

कवयित्री स्त्री के अंतर्मन की उन परतों को खोलती हैं, जहाँ वह प्रेम भी है, संघर्ष भी है, करुणा भी है और प्रतिरोध भी। यह स्त्री नारीवादी नारों की प्रतिध्वनि नहीं है, बल्कि जीवन के अनुभवों से उपजी चेतना है।

(ख) प्रकृति : सौंदर्य नहीं, संवाद

प्रकृति इस संग्रह में मात्र सौंदर्य-चित्रण नहीं है। वह कवयित्री की सहचरी है, संवाद-सहभागी है। आकाश, धरा, पुष्प, ऋतुएँ और नदियाँ—सब भावों के प्रतीक बनकर उपस्थित होती हैं।

प्रकृति यहाँ मनुष्य को—

संयम सिखाती है,

धैर्य देती है,

और जीवन की लय का बोध कराती है।

(ग) मानवीय संबंध : प्रेम, पीड़ा और स्वीकार्यता

प्रेम इस संग्रह में आदर्शवादी नहीं, बल्कि यथार्थवादी है। रिश्तों की ऊष्मा के साथ उनकी जटिलताएँ भी सामने आती हैं। कवयित्री यह स्वीकार करती हैं कि—

संबंधों में टूटन है,

अपेक्षाएँ हैं,

और फिर भी संबंध जीवन का आधार हैं।

यह दृष्टि कविताओं को जीवन के बहुत निकट ले आती है।

(घ) आध्यात्मिक चेतना : धर्म नहीं, करुणा

इस संग्रह की आध्यात्मिकता किसी संप्रदाय या कर्मकांड से नहीं जुड़ी। यह—

आत्मबोध,

क्षणभंगुरता की स्वीकृति,

और मानवीय करुणा

से उपजती है। कविताएँ मनुष्य को भीतर की यात्रा पर आमंत्रित करती हैं।

  1. भाषा, शैली और शिल्प

प्रो. आशा पंकज मूंदड़ा की भाषा इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति है।

सरल

सहज

प्रवाहमयी

भावप्रधान

भाषा में अनावश्यक अलंकारिकता नहीं है, किंतु जहाँ आवश्यकता है वहाँ रूपक और प्रतीक कविता को गहराई प्रदान करते हैं।

शिल्प की दृष्टि से मुक्तछंद का प्रयोग कवयित्री को भावों की स्वतंत्र उड़ान देता है। लय आंतरिक है—भावों की लय।

  1. स्त्री-दृष्टि : संतुलित और विवेकपूर्ण स्वर

यह संग्रह स्त्री-विमर्श के नाम पर आक्रोश नहीं रचता। यहाँ स्त्री—

प्रश्न पूछती है,

अपने अस्तित्व को पहचानती है,

और परिवर्तन की आकांक्षा रखती है।

यह दृष्टि न तो उग्र है, न ही आत्मदया से भरी—यह आत्मगौरव की कविता है।

  1. सामाजिक सरोकार और नैतिक चेतना

कवयित्री समाज के बदलते मूल्यों को गहराई से देखती हैं—

संवेदनहीनता,

आत्मकेंद्रितता,

नैतिक मूल्यों का क्षरण

इन विषयों को कविता में इस प्रकार पिरोया गया है कि वे उपदेश नहीं बनते, बल्कि प्रश्न बनकर उभरते हैं।

  1. पाठकीय अनुभूति : आत्मीय संवाद

इस संग्रह को पढ़ते हुए पाठक स्वयं को अकेला नहीं पाता। कविताएँ जैसे कहती हैं—
“तुम अकेले नहीं हो, यह भाव तुम्हारा ही है।”

यही इस कृति की सबसे बड़ी सफलता है—व्यक्तिगत को सार्वभौमिक बना देना।

  1. साहित्यिक योगदान और समकालीन महत्व

समकालीन हिंदी कविता में जहाँ कहीं-कहीं कृत्रिम बौद्धिकता या शाब्दिक जटिलता दिखाई देती है, वहीं प्रियदर्शिनी संवेदना को पुनः केंद्र में लाती है।

यह संग्रह—

कविता को मनुष्य से जोड़ता है,

साहित्य को जीवन से जोड़ता है,

और भावों को गरिमा देता है।

  1. समालोचनात्मक दृष्टि

आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो कुछ कविताओं में भाव-समानता का आभास होता है, किंतु यह दोष नहीं, बल्कि कवयित्री की भावात्मक निरंतरता का संकेत है। यह संग्रह संतुलित, परिपक्व और विचारोत्तेजक है।

  1. निष्कर्ष : एक संवेदनात्मक उपलब्धि

प्रियदर्शिनी (आत्मिक अभिव्यक्ति : भावों की सच्चाई) एक ऐसी कृति है जो—

पाठक को भीतर से समृद्ध करती है,

संवेदनशील बनाती है,

और जीवन को मानवीय दृष्टि से देखने की प्रेरणा देती है।

यह पुस्तक—

संवेदनशील पाठकों के लिए अनिवार्य पठनीय,

साहित्य-प्रेमियों के लिए संग्रहणीय,

और शोधार्थियों के लिए विचारणीय है।

प्रो. आशा पंकज मूंदड़ा की यह काव्य-कृति हिंदी कविता को संवेदना की एक नई ऊँचाई प्रदान करती है। एक समीक्षक के रूप में मैं निस्संकोच कह सकता हूँ कि यह संग्रह न केवल लेखिका की साहित्यिक साधना का प्रमाण है, बल्कि समकालीन हिंदी साहित्य की मूल्यवान उपलब्धि भी है।

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