
मनुज बली नहि होत है,
समय होत बलवान,
भिल्लन लूटी गोपिका,
वही अर्जुन, वही बाण।
सुनहु भरत भावी प्रबल,
बिलखि कहेऊ मुनिनाथ।
हानि, लाभ, जीवन, मरण,
यश, अपयश विधि हाथ॥
जैसे एक वैद्य के द्वारा दो अलग,
अलग रोग के रोगियों को अलग,
अलग दवा दी जाती है, किसी को
मीठी, किसी को कड़वी दी जाती है।
लेकिन दोनों के साथ भिन्न-भिन्न
व्यवहार किये जाने के बावजूद भी
वैद्य का उद्देश्य एक ही होता है, कि
रोगी को उपचार से स्वस्थ करना।
वैसे ही ईश्वर द्वारा भले ही देखने में
विभिन्न लोगों के साथ भिन्न भिन्न
व्यवहार नजर आये मगर उसका एक
ही उद्देश्य होता है सबका भला करना।
सुदामा को दरिद्र बनाकर तार दिया,
राजा बलि को सम्राट बना तार दिया,
शुकदेव को परम ज्ञानी बनाकर तारा,
तो विदुर को प्रेमी बनाकर तार दिया।
प्रभु ने पांडवों को मित्र बना कर तारा
और कौरवों को शत्रु बनाकर भी तारा,
सबको स्मरण रहे, भगवान केवल
क्रिया से भेद करते हैं भाव से नहीं।
भक्त की भक्ति को भगवान
भी हमेशा ही पहचानते हैं,
भक्ति वह भी है, जब इंसान
इंसान के काम आये,
ज़रूरी नहीं हर समय ईश्वर
का नाम लिया जाये,
आदित्य प्रभू की माया कब
और किसकी समझ आये।
विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र, आदित्य
लखनऊ












