
उम्र के चालीस सालों में
बहुत कुछ खोया,
और बहुत कुछ पाया भी।
लेकिन इस पाने और खोने के बीच
जो खो गया,
वह फिर कभी नहीं मिला।
दिन बदले, महीने बदले,
साल भी बदलते चले गए,
पर समय
जैसे वहीं ठहर गया
मानो कुछ कहना चाहता हो,
मानो कह रहा हो
कहीं भाग जाओ
मगर सवाल वही रहा— कहाँ?
मन के भीतर कहीं छुपी
एक पीड़ा है,
जो मुझे अक्सर
डरा देती है।
अँधेरी रातों में
उसी पीड़ा का उजला-सा साया
मेरे घर की टूटी छत से
झाँक कर मुझे देखता है।
लोगों से सुना है,
कि वक़्त बदल रहा है,
पर पता नहीं क्यों
मेरे हिस्से का समय
अब भी ठहरा-सा है।
आर एस लॉस्टम












