
चाँदनी सफेद मलमल के चादर में है लिपटी,
ये तो क्षीर-सागर की है चिट्ठी।।
हवा नहीं बहती, बाँसुरी का मौन बजता है,
आज राधा नहीं, विरह का आसन सजता है।।
पुलकित धरा ने ओस का श्रृंगार ठहराया है,
हर पत्ता एक शांत दीप बन लहराया है।।
रंगोली नहीं, अदृश्य रंगों का जादू है,
ये रात चिरंतन प्रेम के वादों का साधु है।।
हलचल नहीं, समय की पायल भी चुप है,
सारे सपने एकटक इस अक्षय-घट के अनुरूप हैं।।
चाँद में नहीं, चाँद की परछाईं में जहां सहमा है,
ये चेतना के तल पर अमृत की हर बूंद का कहना है।।
कोई कथावाचक नहीं, कथा खुद में खोई है,
मन की वीणा पर अनाहत ध्वनि बोई है।।
न खीर का स्वाद, न जागृति का शोर है,
ये अंतर्मन के शून्य का अलौकिक भोर है।।
रीना कहती खोल कर आंखों के पट देख,
यही वह रात है,जहाँ प्रश्न भी उत्तर बनता है,
अंधेरे का भय, प्रकाश से सुंदर बनता है।।
पूरी है ये,पर पूर्णता से परे जाती है,
शरद पूर्णिमा! तू मौन में महाकाव्य गाती है।।
चाँदनी सफेद मलमल के चादर में है लिपटी,
ये तो क्षीर-सागर की है चिट्ठी।।
रीना पटले (शिक्षिका)
शास. हाई स्कूल ऐरमा
सिवनी (मध्य प्रदेश) भारत












