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सुकून की तलाश

सुकून की तलाश में मैं तो ,
बिन सुकून भटक रहा हूॅं ।
सुकून को भटकते भटकते ,
मैं सुकून ही गटक रहा हूॅं ।।
बढ़ रहा हूॅं मैं पथ को छोड़ ,
अन्य देख चटक रहा हूॅं ।
पटका रहा स्वयं पग पग ,
मुझे लगा मैं पटक रहा हूॅं ।।
चाह रहे सबको अटकाना ,
पग पग मैं अटक रहा हूॅं ।
वाणी बोलूॅं मैं मीठा जहर ,
सबको मैं खटक रहा हूॅं ।।
जन जन को टकराने हेतु ,
नारद सा घटक रहा हूॅं ।
दो के बीच में पकड़ाने पे ,
धीमे से मैं छटक रहा हूॅं ।।
मिलता है जब कटु वाणी ,
चुपचाप मैं सटक रहा हूॅं ।
सबमें टाॅंग अड़ाने कारण ,
स्वयं ही मैं लटक रहा हूॅं ।।
शब्दार्थ : चटकना = जलना , चौंकना ,
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना

अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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