
छत्तीसगढ़ी कविता
देह म गोदना, मया के चिन्ह आय,
थोर–थोर पीरा, कहानी बन जाय।
कागज नई चाही, चमड़ी म लिखाय,
पीढ़ी दर पीढ़ी, पहचान सिखाय।
माई के हाथ, सुई के नोक म कला,
हर रेखा म बसे, माटी के जरा।
नदी, पंछी, फूल, सुरता के चिन्ह,
जीवन के संग चलय, गोदना के बिंह।
दुख–सुख के गीत, देह म बसाय,
गोदना म संस्कृति, सांस–सांस समाय।
आज घलो कहिथे, चुपचाप सही,
छत्तीसगढ़ के मया, गोदना म लही।
रचनाकार
“कौशल”












