
चलना भी सिखाती हैं, रास्ता भी दिखती है।
ये ठोकरें ही तो, संभालना भी सिखाती है।
कहाँ तक रेत पर चलकर, बनाओगे महल अपना,
ये ठोकरें ही तो,हक़ीक़त से मिलाती हैं।
अँधेरों में भटकने का, हुनर भी एक नेमत है,
ये ठोकरें ही तो, दिये दिल के जलाती हैं।
जिन्हें हम भूल बैठे थे, कि मंज़िल और आगे है,
ये ठोकरें ही तो,वो यादें भी दिलाती हैं।
नज़र आती नहीं जब तक, कोई दीवार रस्ते में,
ये ठोकरें ही तो,नज़र ऊँची कराती हैं।
कौन है अपना, पराया कौन है जग में।
ये ठोकरें ही तो, हक़ीक़त से मिलाती हैं।
रचनाकार
रीना पटले शिक्षिका
शास.हाई स्कूल ऐरमा, कुरई
जिला -सिवनी मध्यप्रदेश












