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किस्से ज़िंदगी के

किस्से ज़िंदगी के, यूँ सरेआम न कर ;
हक दिया है अपनेपन का तो कत्लेआम न कर।।

ये मासूमियत से भरी ज़िंदगी बड़ी नाजुक और नखरे वाली;
कहकर इश्क सी मोहब्बत इसे बदनाम न कर ।।

बदनाम हुए नही तो कर दिए जाएगे बेदखल खारिज ; तू पहचान बता सिर्फ अपनी हमे गुनहगार न कर।।

सुना है वकील है वो अपनी मोहब्बत के ;
बना कर के काजी हमारी मोहब्बत के यूँ इन्हे दागदार न कर।।

मुलाक़ातों की कुछ तो गुंजाइश रहने दे न सरल,पिलाकर घूंट मय गरल के इसे बे आराम न कर ।।

संदीप शर्मा सरल।।
देहरादून उत्तराखंड।।

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