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लघु कथा : काग़ज़ की नाव


सुबह की धूप फैलने से पहले ही सोनू चाय की दुकान पर गिलास माँजने लगता था। उसकी उम्र किताबों से दोस्ती करने की थी, पर हाथों में जले हुए गिलास और आँखों में थकान थी।
सड़क से स्कूल जाते बच्चों की हँसी उसके दिल में चुभ जाती।
दुकानदार की कड़ी आवाज़ आई—
“ध्यान से काम कर, पढ़ने-लिखने से पेट नहीं भरता।”
सोनू चुप रहा।
रात को वह एक फटे हुए काग़ज़ से नाव बनाता। वही काग़ज़ कभी किताब का पन्ना रहा होगा। उस नाव में वह अपने सपने रखकर बहा देता।
एक दिन तेज़ बारिश हुई। नाली में बहते पानी में सोनू ने अपनी नाव छोड़ दी। नाव आगे बढ़ती रही—न डरी, न रुकी।
उसी समय एक बच्ची पास आकर बोली—
“तुम स्कूल क्यों नहीं आते?”
सोनू ने कहा—
“मेरे सपने पढ़ते हैं, मैं नहीं।”
उस रात सोनू देर तक सो नहीं पाया।
अगली सुबह वह चाय की दुकान नहीं गया। हाथ में किताब थी, आँखों में डर और दिल में साहस।
सालों बाद उसी गली में एक स्कूल खुला।
दीवार पर लिखा था—
“बाल श्रम अपराध है, शिक्षा अधिकार।”
और स्कूल के शिक्षक का नाम था— सोनू।

डाॅ आरती वाजपेयी
लखनऊ उ.प्र.

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