
भारत की युवा शक्ति को यदि किसी एक विचारधारा ने सबसे अधिक झकझोरा है, तो वह स्वामी विवेकानन्द की वाणी है। वे केवल एक संन्यासी नहीं थे, बल्कि युवाओं में आत्मविश्वास, साहस और राष्ट्रभक्ति का संचार करने वाले महापुरुष थे। उनका जीवन स्वयं एक संदेश था—उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत।
स्वामी विवेकानन्द मानते थे कि युवा वह शक्ति है जो राष्ट्र का भविष्य गढ़ती है। उनके लिए शिक्षा का अर्थ केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं था, बल्कि चरित्र निर्माण, आत्मबल और सेवा भाव था। वे कहते थे कि जिस शिक्षा से मनुष्य निर्भीक बने, वही सच्ची शिक्षा है। यही कारण है कि उनका विचार आज भी युवाओं के लिए मार्गदर्शक है।
उन्होंने युवाओं को आत्मग्लानि और हीन भावना से बाहर निकलकर अपने भीतर छिपी शक्ति को पहचानने का आह्वान किया। उनका विश्वास था कि प्रत्येक युवा में ईश्वर का अंश विद्यमान है और जब वह इसे समझ लेता है, तब कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती।
आज के भौतिकतावादी और भ्रमित समय में स्वामी विवेकानन्द का संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है। जब युवा दिशाहीनता, तनाव और निराशा से जूझ रहा है, तब विवेकानन्द का जीवन हमें बताता है कि संकल्प, साधना और सेवा से ही सच्ची सफलता मिलती है।
युवा दिवस केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि एक संकल्प है—स्वामी विवेकानन्द के विचारों को जीवन में उतारने का। यदि आज का युवा उनके आदर्शों को अपना ले, तो भारत को विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता।
डाॅ आरती वाजपेयी
लखनऊ उ.प्र.












