
ध्यानहेयास्तद्’वृत्तयः ।
तद्’वृत्तय:= उन क्लेशों की स्थूल वृत्तियाँ ध्यानहेया:= ध्यान के द्वारा नाश करने योग्य हैं ।
अनुवाद– उन क्लेशों की स्थूल वृत्तियाँ ध्यान के द्वारा नष्ट करने योग्य हैं ।
व्याख्या– क्लेश की वृत्तियां भी तीन प्रकार की होती हैं । स्थूल, सूक्ष्म और कारण । स्थूल वृत्तियाँ वे हैं जो कर्मों के द्वारा व्यवहार एवं आचरण में प्रयुक्त होती हैं जैसे किसी की हिंसा करना, राग-द्वेष रखना, झगड़ा, मन मुटाव रखना गर्व करना, दूसरों को दुख देना, पीड़ा पहुंचाना, सदा भयभीत रहना आदि ।इसलिए पतंजलि कहते हैं कि यह जो इसका स्थूल वाह्य स्वरूप है उसे सबसे पहले क्रिया योग द्वारा सूक्ष्म करना चाहिए । दसवें सूत्र में बताए गए क्रिया योग से यह स्थूल वृत्तियाँ सूक्ष्म होती हैं तथा ध्यान से यह नष्ट हो जाती हैं । इस प्रकार इनको नष्ट करना चाहिए । अविद्या के संस्कार को ही नष्ट कर देने से यह वृत्तियाँ फिर नहीं उभरतीं । इन्हे क्रिया योग से कमजोर करके ध्यान द्वारा सूक्ष्म किया जाता है। फिर समाधि द्वारा इन्हें निर्बीज किया जाता है तभी यह नष्ट होती हैं । वे भुने हुए बीज के समान हो जाती हैं जिनसे फिर अंकुर नहीं निकलता । क्रिया योग के बिना समाधि की योग्यता नहीं आती इसलिए क्रिया योग से ही आरम्भ कर निर्बीज समाधि में इन्हें नष्ट करना चाहिए ।
स्रोत– पतंजलि योग सूत्र
लेखन एवं प्रेषण–
साधक- बलराम शरण शुक्ला हरिद्वार












