
तन्हाइयों को मिलती हूं तो लगता है…
जैसे कोई बिल्कुल करीब बैठ के कह रहा है
कुछ दीवारों की सांसों में रुकी है धड़कने
पलकों के शामियाने में संजोए है सपने
थम थम के नमी नम्र निवेदन से सम्भल रहा है
जुबां है ख़ामोश आज़ इल्तिज़ा है लफ्ज़ों की
अनकहे वर्ण और व्यवस्थित शब्दों का संसार
कागज़ की कश्ती पर सुनहरी यादों का भंडार
हर एक विषय वस्तु में बसी मुफ्त की आवाज
महीन महीन दरारों में लिखी मोहब्बतें इतिहास
ख़ामोश खाली हवा झोंकों की ये अनंत बरसात
कुछ अधूरे तेरे संवाद वो चांद सितारों की रात
बारिश की बूंदें मौन नदियों का किनारा
शून्य का आकार गहराईयों में उतरता है
अश्कों में नहीं गहरे स्याह पर उतरता है
शब्दों की आवाजें आईने के सामने निखरती है
तन्हाइयों में तन्हा तन्हा खामोशियां ठिठुरती है…..
तन्हाइयों से मिलती हूं तो लगता है।।
रजनी कुमारी
लखनऊ,उत्तर प्रदेश












