
तिल की खुशबू, गुड़ की मिठास,
हृदयों में भर दे नया विश्वास।
सूरज बोले—“अब अंधेरा हार गया”,
उत्तरायण में जीवन फिर मुस्काया।
खेतों में लहराए सपनों का धान,
किसान के माथे पर चमका अभिमान।
श्रम की तपिश जब रंग लाती है,
धरती अन्न से भर जाती है।
पतंगों ने छुआ आज खुला गगन,
छतों पर खिल उठा बचपन का मन।
डोर के संग जुड़ी उम्मीदें हज़ार,
हवा ने सिखाया उड़ना बार-बार।
ठंड की विदाई, ऊष्मा का आगमन,
दिन बढ़े, घटे रात्रि का बंधन।
प्रकृति ने बदली अपनी पहचान,
नव ऊर्जा से जागा हर प्राण।
मकर संक्रांति का यही संदेश,
त्यागो द्वेष, अपनाओ विशेष।
जीवन को दो नई दिशा,
सूर्य-सा उजला हो हर विश्वास।
लेखक:–
महेंद्र कुमार मिठारवाल
श्रीमाधोपुर, सीकर (राजस्थान)












