
! !१!!
अपरोक्षानुभूति में भगवान् शंकराचार्य कहते है —
स्ववर्णाश्रम धर्मेण तपसा हरि तोषणात ।
साधनं प्रभवेत् पुंसां वैराग्यादिचतुष्टयं ।।
अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार —
तत्परता पूर्वक कर्म करके,
हरि की आराधना करने से,
मनुष्य को साधनचातुष्टय {वैराग्य, विवेक,षट्संपत्ति, मुमुक्षुत्व}
प्राप्ति होती है ।।
१. वैराग्य —
२. विवेक —
३. षट-सम्पत्ति —
शम , दम , उपरती , तितिक्षा, श्रद्धा , समाधान
४. मुमुक्षुत्व —
जब इनका उदय होता है,
तब आत्मज्ञान का मार्ग खुलता है,
और इस ज्ञान अग्नि के कारण मनुष्य के पूर्व संस्कार दग्ध हो जाते है जलकर नष्ट हो जाते हैं,
अर्थात् ….. व्यक्ति प्रभु के सायुज्य का पात्र हो जाता है ।।
हरिकृपा ।।
मंगल कामना ।।












