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कल्पकथा साहित्य संस्था परिवार द्वारा चतुर्थ स्थापना दिवस पर ‘एक वृक्ष–एक दीप’ अभियान का राष्ट्रव्यापी आयोजन।

देश भर से जुड़े सृजनकारों ने काव्य गोष्ठी में जमाया रंग।

कल्पकथा साहित्य संस्था परिवार द्वारा अपने दो दिवसीय चतुर्थ स्थापना दिवस के पावन अवसर पर एक व्यापक, प्रेरक एवं राष्ट्रभाव से ओतप्रोत सामाजिक–सांस्कृतिक अभियान ‘एक वृक्ष – एक दीप’ का आयोजन देश के विभिन्न राज्यों एवं नगरों में एक साथ किया गया। यह अभियान पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक उत्तरदायित्व, राष्ट्रीय एकता तथा भारतीय सेना के शौर्य और बलिदान के प्रति कृतज्ञता का जीवंत प्रतीक बनकर उभरा।

इस विशेष अवसर पर शनिवार १० जनवरी २०२६ को संस्था से जुड़े साहित्यकारों, रचनाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं संवेदनशील नागरिकों ने अपने-अपने निवास स्थानों पर प्रातः काल वृक्षारोपण कर प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया तथा सायंकाल भारतीय सेना, सैनिकों एवं परम बलिदानी योद्धाओं के सम्मान में दीप प्रज्ज्वलन कर राष्ट्र के प्रति अपनी भावनात्मक निष्ठा व्यक्त की।

‘एक वृक्ष – एक दीप’ अभियान का मूल उद्देश्य दो स्तरों पर समाज को जागरूक करना रहा— प्रथम वृक्षारोपण के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, जीवन संतुलन एवं भावी पीढ़ियों के प्रति उत्तरदायित्व का बोध तथा द्वितीय दीप प्रज्ज्वलन के माध्यम से भारतीय सेना, सैनिकों एवं शहीदों के त्याग, पराक्रम और राष्ट्ररक्षा के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता का सार्वजनिक प्रकटीकरण।

कल्पकथा साहित्य संस्था का मानना है कि साहित्य केवल शब्दों का सौंदर्य नहीं, बल्कि कर्म का संकल्प भी है। जब साहित्य सामाजिक चेतना से जुड़ता है, तभी वह जन–जन के हृदय में स्थायी परिवर्तन ला सकता है।

इस अभियान की विशेषता यह रही कि यह केवल किसी एक नगर या प्रदेश तक सीमित न रहकर, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, बिहार, राजस्थान, गुजरात, तेलंगाना, हरियाणा, जम्मू–कश्मीर सहित देश के विभिन्न हिस्सों तक फैला। सहभागी सभी जनों ने एक साझा भाव के साथ, अलग-अलग भौगोलिक सीमाओं में रहते हुए भी, एक ही उद्देश्य को साधा।

इस पुनीत अभियान में साहित्यसेवियों एवं सामाजिक सहभागियों ने अपने-अपने नगरों में सक्रिय सहभागिता निभाई जिनमें श्री गोपाल कृष्ण बागी जी हल्द्वानी उत्तराखण्ड, श्रीमती ज्योति राघव सिंह जी वाराणसी उप्र, श्री बिनोद कुमार पाण्डेय जी नोएडा उप्र, श्री अमित पण्डा ‘अमिट रोशनाई’ जी रायगढ़ छग, श्री भास्कर सिंह माणिक जी कोंच उप्र, श्री मोहन अग्रवाल जी भोपाल मप्र, डॉ. श्याम बिहारी मिश्र जी गोरखपुर उप्र, श्रीमती ज्योति प्यासी जी जबलपुर मप्र, डॉ. श्रीमती जया शर्मा ‘प्रियंवदा’ जी सूरदास सीही फरीदाबाद हरियाणा, श्रीमती आनंदी नौटियाल ‘अमृता’ जी उत्तरकाशी उत्तराखण्ड, श्री विजय रघुनाथराव डांगे जी नागपुर महाराष्ट्र, श्री विष्णु शंकर मीणा जी हरिनगर पीपल्दा कोटा राजस्थान, श्रीमती शोभा शर्मा जी छतरपुर मप्र, श्री सुरेश उपाध्याय जी मुंबई महाराष्ट्र, श्री अर्चित सावर्णी जी औरंगाबाद बिहार, श्री शशिधर कुमार जी कटिहार बिहार, श्री अंजनी कुमार चतुर्वेदी ‘श्रीकांत’ जी निवाड़ी मप्र, श्री प्रमोद पटले जी रायपुर छग, कुमारी खुशी मल्होत्रा ‘नेहा’ जी जम्मू जम्मू–कश्मीर, श्री सुनील कुमार खुराना जी नकुड़ सहारनपुर उप्र, श्री रमेश चंद्रा गौतम जी शामली उप्र, श्रीमती रजनी कटारे ‘हेम’ जी जबलपुर मप्र, श्रीमती प्रणिता प्रवीण कारीकर जी इंदौर मप्र, डॉ. श्रीमती मंजू शकुन खरे जी दतिया मप्र, श्री चंद्र प्रकाश गुप्त चन्द्र बुंदेला जी अहमदाबाद गुजरात वर्तमान में हैदराबाद तेलंगाना, कल्पकथा संस्थापक दीदी श्रीमती राधा श्री शर्मा जी सोनीपत हरियाणा, पवनेश मिश्र कल्पकथा साहित्य संस्था परिवार आदि प्रमुख रहे। इन सभी सहभागियों ने अपने-अपने नगरों में वृक्षारोपण किया तथा संध्या समय दीप प्रज्ज्वलन कर भारतीय सेना के सम्मान में मौन भाव से नमन किया।

दो दिवसीय आयोजन में दूसरे दिन भास्कर सिंह माणिक के मंच संचालन में आयोजित काव्यगोष्ठी में देश भर से जुड़े सृजनकारों ने रंग जमाया। काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता नागपुर महाराष्ट्र के विद्वान साहित्यकार श्री विजय रघुनाथराव डांगे ने की जबकि मुख्य अतिथि के रूप में शामली उत्तर प्रदेश से युवा कवि रमेश चंद्रा गौतम ने पदभार संभाला।

‘एक वृक्ष – एक दीप’ अभियान को भविष्य में और व्यापक स्वरूप देने का संकल्प भी इस अवसर पर लिया गया। संस्था आने वाले वर्षों में इसे वार्षिक अभियान के रूप में विकसित करने तथा अधिक से अधिक युवाओं, विद्यार्थियों एवं साहित्यप्रेमियों को इससे जोड़ने की दिशा में कार्य करेगी।

कल्पकथा साहित्य संस्था परिवार का यह चतुर्थ स्थापना दिवस केवल उत्सव नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और राष्ट्रप्रेम का साझा संकल्प बनकर इतिहास में अंकित हुआ। यह अभियान इस बात का सशक्त उदाहरण है कि जब साहित्य, समाज और राष्ट्रभाव एक साथ चलते हैं, तब सृजन केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म में भी प्रकट होता है।

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