आसमन म उड़थे रंग-बिरंगी पतंग,
मन ल घलो उड़ाथे, कर देथे उमंग।
डोर म बंधे सपने, हावा संग लड़े,
हर झोंका म हिम्मत, नइ कभू हारे।
छत म खड़े लइका, आंखी म चमक,
हंसी-ठिठोली संग गूंजे हर दमक।
कटे त गिर जाथे, फेर उठे उड़ाय,
जीवन जइसने हरे, हार म घलो सिखाय।
सूरज के किरन संग खेले पतंग,
माटी ले जुड़के, छुए आसमान रंग।
डोर कस मजबूत रख, मन कस उड़ान,
तभे त बनही जिनगी, सुंदर पहिचान।
हावा क रुख समझ, पतंग ल नचाय,
सब्बो झोंका संग अपन चाल सिखाय।
जिनगी म घलो एइसने खेल होथे,
समय के संग चलना, सबले बड़े मोथे।
कभू ऊँच उड़ही, कभू नीचे आवे,
फेर घलो हिम्मत अपन डोर कस थामे।
पतंग सिखाथे — नइ छोड़ भरोसा,
संघर्ष म घलो चमके, उम्मीद के रंग ।
रचनाकार
“कौशल”
छत्तीसगढ़












