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अनकहे


वह जब भी हमारे घर आती है, ठहर जाता हूँ मैं,
बिन कहे ही हर मुलाक़ात में उतर जाता हूँ मैं।

कुछ शब्द, कुछ मुस्कानें, बहुत-सा मौन बीच में,
उसी ख़ामोशी में हर बात समझ जाता हूँ मैं।

न वक़्त की जल्दी दिखती है, न दिल की आहट सुनता,
उसके सामने बैठकर बस बहक जाता हूँ मैं।

वह सुनती रहती है सब, कुछ भी कहे बिना,
और उसके मौन में हर उत्तर पा जाता हूँ मैं।

मेरे प्रेम को न नाम चाहिए, न कोई इकरार,
इस साझा सन्नाटे में ही रह जाता हूँ मैं।

अब कुछ महीनों से मेरे भाव उलझने लगे हैं,
हर रात उसकी याद में सिमट जाता हूँ मैं।

उसकी हँसी, नज़र, झुका-सा हुआ वह पल,
हर छोटी-सी बात पर पिघल जाता हूँ मैं।

सोचता हूँ—यह केवल आकर्षण तो नहीं,
या वह प्रेम है जिसमें डूब जाता हूँ मैं।

कभी यह भाव दर्द बनकर ठहर जाता है,
कभी अनजानी खुशी में बदल जाता हूँ मैं।

अगर प्रेम कहना ज़रूरी होता शब्दों में,
तो शायद इतना गहरा न रह जाता हूँ मैं।

आर एस लॉस्टम

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