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तीसरी परछाईं का प्रकट होना

अध्याय 8

(गाँव का सबसे गहरा, सामूहिक महकता पाप)
गुलनारी की परछाईं हवा में घुलते ही ऐसा लगा जैसे पूरी रात का वजन अचानक बढ़ गया हो। मानो आसमान खुद झुककर गाँव की छाती पर बैठ गया हो। कोई हिला नहीं। लोग जहाँ खड़े थे, वहीं जड़ हो गए। चेहरों का रंग राख जैसा पड़ गया था, साँसें सूनी और भारी।
गंगाराम ने धीमे स्वर में कहा—
“अब वह आएगा…
जिसका कोई नाम नहीं रहा,
जिसकी कोई कब्र नहीं बनी,
और जिसकी मौत का आज तक कोई दोषी नहीं ठहराया गया।”
राशिराम के होंठ काँपने लगे।
“गंगा… ये कौन है?”
गंगाराम ने गहरी साँस ली।
“वह… जिसके खून से इस गाँव की नींव भीगी है।”
अचानक सन्नाटा और गहरा हो गया।
चौपाल के बीचों-बीच रखा टूटा हुआ पत्थर का चबूतरा हल्का-सा काँपने लगा।
यही वह चबूतरा था, जहाँ सालों पहले पंचायत बैठी थी—
वही पंचायत, जिसने एक आदमी की बात सुने बिना
उसे अपराधी ठहरा दिया था।
उस आदमी का नाम था— भोलाराम।
एक मज़दूर।
न घर, न ज़मीन, न कोई अपना।
सिर्फ मेहनत, भूख और मजबूरी।
उसकी बस एक ही गलती थी—
वह गलत वक्त पर, गलत जगह खड़ा था।
उसे चोर कहा गया,
दलाल कहा गया,
उसकी जात का नाम लेकर उसे पीटा गया—
और इसी चबूतरे के सामने
उसे ज़िंदा जला दिया गया।
लोगों ने तब कहा था—
“गाँव की सुरक्षा के लिए ज़रूरी था।”
लेकिन सच यह था—
भोलाराम किसी साज़िश का शिकार था।
किसकी?
यह सवाल कभी किसी ने नहीं पूछा।
अब उसी चबूतरे की दरारों से धुआँ उठने लगा—
पहले काला,
फिर लाल,
फिर राख जैसा भूरा।
लोग पीछे हटने लगे।
धुएँ के बीच एक आकृति बनने लगी—
धीमी, भारी,
मानो वह कोई इंसान नहीं
बल्कि सदियों का दुख उठाए खड़ा हो।
तीसरी परछाईं— भोलाराम।
धुआँ धीरे-धीरे
एक आदमी की आकृति में ढल गया।
देह धधक रही थी—
जैसे उसके भीतर अब भी वही आग जल रही हो
जिसने कभी उसे ज़िंदा खा लिया था।
औरतें रो पड़ीं।
कुछ आदमी पीछे हट गए।
एक युवक डर के मारे ज़मीन पर गिर पड़ा।
भोलाराम की परछाईं एक क़दम आगे बढ़ी।
कोई आवाज़ नहीं—
लेकिन हवा में जली हुई चर्बी की गंध फैल गई।
उस गंध ने बूढ़ों को
उनकी जवानी की वह रात याद दिला दी—
भीड़, चीखें, आग और तालियाँ।
राशिराम की आवाज़ गले में अटक गई—
“गंगा… ये…?”
गंगाराम ने मुँह फेर लिया।
“हाँ, राशिराम।
जो ज़िंदगी में कभी सुना नहीं गया,
वह आज अपना सच कहने आया है।”
खून का आरोप
भोलाराम की परछाईं ने
राख से भरी उँगली उठाई—
सीधे उन बूढ़ों की ओर,
जो उस वक्त पंचायत के सरदार थे।
उनकी आँखें झुक गईं।
किसी की ज़ुबान नहीं चली।
गंगाराम बोला—
“यह किसी एक आदमी का पाप नहीं था।
यह पूरे गाँव का अपराध था।”
एक बूढ़ा काँपते हुए फुसफुसाया—
“हमसे… हमसे गलती हो गई थी।”
परछाईं धीरे-धीरे उसके सामने पहुँची।
वह आदमी ज़मीन पर गिर पड़ा।
उसके शरीर में झटके आने लगे—
मानो वही रात
उसकी आँखों में फिर से जल उठी हो।
कोई उसे छूने की हिम्मत नहीं कर पाया।
सच की आग
परछाईं ने चबूतरे की ओर देखा—
और अचानक
दरार से एक हल्की नीली आग उठी।
कमज़ोर…
पर सच्ची।
लोग घबरा गए।
“गंगा! ये आग तो अपने आप…!”
गंगाराम की आवाज़ कठोर हो गई—
“यह इंसाफ़ की आग है।
अब गाँव को उस रात का हिसाब देना होगा।”
भोलाराम की जलती आँखें भीड़ पर घूमीं—
और तभी उसकी आवाज़ पहली बार सुनाई दी—
धुएँ जैसी भारी, काँपती, पर साफ़—
“मेरी मौत का दोषी कोई एक नहीं था…
पर शुरुआत किसी एक ने ही की थी।”
गाँव में सिहरन दौड़ गई।
राशिराम ने डरते हुए पूछा—
“गंगा… वो कौन था?”
गंगाराम ने चुपचाप भीड़ को देखा,
फिर बोला—
“जिसने भोलाराम को जलाया,
वह अभी ज़िंदा है…
और यहीं खड़ा है।”
हड़कंप मच गया।
लोगों की निगाहें
एक-दूसरे के चेहरों पर दौड़ने लगीं।
गंगाराम ने हाथ उठाकर कहा—
“भागने से सच नहीं बदलता।
तीसरी परछाईं
किसी को नहीं छोड़ेगी।”
भोलाराम की परछाईं आगे बढ़ने लगी—
धीरे-धीरे,
पूरे गाँव को देखते हुए।
और सब समझ गए—
अब जो खुलने वाला है,
वह किसी की ज़िंदगी बदल देगा…
और शायद
किसी की मौत भी।

आर एस लॉस्टम

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