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हमर पहुना

हमर पहुना आथे त घर झनका जाथे,
सूना आँगन म खुशी झन-झन छा जाथे।
माटी महक उठे, चूल्हा मुस्काथे,
पहुना संग संग सुख-दुख बतिया जाथे।

पानी-पखरा ले स्वागत हो जाथे,
मीठ बोली म अपनापन झर जाथे।
चउर-भाजी के खुशबू फइल जाथे,
मन के कोठा म उजास भर जाथे।

पहुना खातिर दिल झन थकथे,
सेवा म हाथ झन कभू रुकथे।
लाज-सरम सब दूर हो जाथे,
मया-प्रीत म नाता गुँथ जाथे।

हँसी-ठिठोली संग रात कट जाथे,
कहानी म बचपन लौट आथे।
पहुना जाए त आंखी भर आथे,
मन पूछे – काबर जल्दी जाथे।

हमर संस्कृति के पहचान ये नाथे,
पहुना म भगवान बस जाथे।

रचनाकार –” कौशल”

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