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विषम घड़ी

कैसे ये विषम घड़ी है,
सबको यहां अपनी पड़ी है।

झूठ कर रहा अपमान सत्य का
देखो साथियों कुछ तो गड़बड़ी है।

मानवता हाथ जोड़े ,
लज्जित हुई खड़ी है।
हया उठकर चल रही महफिल से,
बेशर्मी की जिसमें हिम्मत बढ़ी है।

दिखावे के चक्कर में, पैसों की पड़ी है।
सहयोग की भावना भूलते जा रहे
लंबी हुई स्वार्थ की कड़ी है ।

हम केवल सुख को चाहते हैं
शांति हर जगह तिरस्कृत खड़ी है।
समय को बदलो रंग ना बदलो ,
चेहरे पर ना जाने कितनी परत चढ़ी है।

प्रतिष्ठित नहीं यहां कोई,
धनवान बनने की हड़बड़ी है ।
प्रेम नहीं है किसी को किसी से
पैसे पर ही नज़र गड़ी है।

             स्वरचित कविता 
         अनिता महेश पाणिग्राही
           सरायपाली छत्तीसगढ़

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