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पूण्य भारी पड़ रहा है: एक सत्य कथन


ईश्वर की भक्ति, उपासना,
भक्ति और पूजा पर आस्था,
प्रभू पर आस्था व विश्वास,
बन जाते हैं जीवन की आस।

जी, हाँ! ‘पूण्य भारी पड़ रहा है’ पिछले कुछ दिनों पहले एक मित्र ने मेरी कैंसर की बीमारी से लड़ने का हौसला देखकर कहा था। ईश्वर की भक्ति, पूजा और उस पर पूरी श्रद्धा, अडिग आस्था और विश्वास मनुष्य को जीवन में दुखी नहीं होने देते।
पिछले सितंबर 2025 में जब मुझे प्रोस्टेट कैंसर होने का पता चला और इलाज के साथ साथ मुझमें उस जानलेवा बीमारी से जूझने की इच्छा शक्ति देखकर मेरे मित्रों ने यही कहा था कि सर आपका पूण्य बीमारी पर भारी पड़ रहा है।
तब से लेकर आज तक मुझे यह कथन भूलता नहीं है और ईश्वर के प्रति मेरी आस्था व विश्वास अडिग रूप से यथावत् न केवल स्थिर है बल्कि और अधिक दृढ़ हो चुका है।
जिसकी अनुभूति कल अर्थात् 16 जनवरी 2026 को मुझे एक बार फिर से जाग्रत हुई जब मेरे साथ अचानक कार से टकरा कर दुर्घटना हुई और मैं दुर्घटना ग्रस्त होने के बाद भी सुरक्षित श्री जन कल्याणेश्वर महादेव मंदिर अखण्ड रामायण के समापन में पूरी तरह सुरक्षित रूप से शामिल हो सका।

पूरी घटना इस प्रकार है कि श्री जन कल्याणेश्वर मंदिर में 15 जनवरी से अखण्ड रामायण का पाठ हो रहा था और मैं पूरी क्षमता के साथ सक्रिय रूप से मुख्य भक्त के रूप में शामिल हो रहा था।

कल समापन के पहले चूँकि मैं पैंट और जैकेट पहने हुए था तो पंडित बृजेश मिश्र ने अनुरोध किया कि मैं धोती-कुर्ता पहन लूँ जैसा मैं हमेशा पहनता हूँ तो मैं घर आ गया।
कल 16 जनवरी को लगभग दोपहर 1:00 बजे समापन के पहले घर से बस 150 मीटर दूर स्थित मंदिर की ओर जा रहा था तो मेरे पड़ोस में रहने वाले पति-पत्नी जो कार से जा रहे थे, मुझे देखकर रुके, गाड़ी से उतरकर मेरा आशीर्वाद लेकर फिर आगे जाने लगे, इतने में एक कार ने पीछे से मुझे धक्का मार दिया शायद अनजाने में। मैं सड़क पर गिर गया और कार का अगला बायाँ पहिया मेरे शरीर से टकरा गया, मुझे लगा कि कोई अनहोनी हो गयी, शायद मेरी आहत भरी आवाज़ सुनकर आगे जा रहे पति- पत्नी कार रोककर दौड़कर मेरे पास आये, तब तक धक्का देने वाली कार भी रुक गयी और उसमें सवार दो महिलायें घबराकर मेरे पास आ गईं, मैं अपने आप उठ नहीं पा रहा था, डर भी था कि कहीं कोई चोट न आ गई हो। उन सबने मिलकर मुझे उठा कर खड़ा किया, सहारा देकर चलाया, उन्हें पता था कि मैं मंदिर जा रहा हूँ इसलिये मुझे मंदिर तक पहुँचाने को कहने लगे। पर मैंने तब तक महसूस किया कि मुझे कोई चोट नहीं आयी और मैं अखण्ड रामायण की पूजा समापन
में पूरे मनोयोग से शामिल हो सका।
कार्यक्रम समापन के उपरांत मैंने अपने संबोधन में वहाँ उपस्थित सभी लोगों को उस घटना की जानकारी दी और ईश्वर का स्मरण करते हुए धन्यवाद दिया साथ ही ईश्वर की भक्ति में मेरी आस्था और दृढ़ विश्वास का परिचय भी दिया। सबसे यही निवेदन भी किया कि परमपिता परमात्मा की कृपा अपने भक्तों पर सदैव बनी रहती है।
इस घटना से मुझमें जो आत्मविश्वास ईश्वर भक्ति और उनकी कृपा पर दृढ़ विश्वास बढ़ा, उसके लिए सभी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया।

विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ:

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