
यादों का बसेरा था, मेरा पुराना घर,
जहां बचपन बीता,होकर निर्भय निडर।
छोटी-छोटी यादों से,सजा हुआ था घर,
काश वो लम्हा आता ,फिर से एक बार
लौटकर ।
मां का वह अपने हाथों से सजाया रसोई घर,
जहां बैठ हम खाते प्रेम से पेट भर।
दादा – दादी का वह ,लाड प्यार,
घर के हर कोनों में बसा संसार।
पापा का ड्यूटी से लौटकर ,वह पढ़ाना
याद आता है ,
हमारे जीवन का यह सुनहरा पल,हमे बहुत भाता है।
घर का वह कोना,जहां हम छिप जाते थे,
जहां छिपने पर हमें,कोई ढूंढ ना पाते थे।
ढह गई वह दीवारें ,ढह गए वह छत,
न रही खिड़की,ना रहा वह घर ।
रह गई बस यादें, मन को बड़ा लुभाता है,
जब जब गुजरते उस गलियों से पुराना लम्हा याद आता है।
स्वरचित रचना
प्रतिभा दिनेश कर
विकासखण्ड सरायपाली
जिला महासमुन्द












