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सुरंग, परछाइयाँ और पहला नाम

लौटती हुई रातों के चेहरों के बीच,
सुरंग के भीतर गंगाराम के सामने उभरी वह परछाईं
धीरे-धीरे धुँध में घुलने लगी—
जैसे उसका होना केवल चेतावनी देने के लिए था,
ठहरने के लिए नहीं।
कुछ ही पलों में वहाँ
सिर्फ़ ठंडी हवा और नमी भरा सन्नाटा रह गया।
गंगाराम ने लालटेन को कसकर थाम लिया
और भारी क़दमों से सुरंग से बाहर की ओर बढ़ने लगा।
जैसे-जैसे वह उजाले के पास आता गया,
उसे लगा कि अँधेरा उसकी पीठ पर पंजे गड़ा रहा है—
मानो सुरंग उसे वापस खींच लेना चाहती हो,
मानो कहना चाहती हो—
अभी बहुत कुछ बाक़ी है,
अभी सब कुछ उजागर नहीं हुआ है।
जब वह बाहर पहुँचा,
तो गाँव के लोग चौकन्ने खड़े थे—
हर चेहरा सवालों से भरा,
हर नज़र बेचैन।
राशिराम दौड़ता हुआ उसके पास आया—
“गंगा! का देखा तूने?
कौन थी वो परछाईं?
का सच सुरंग के भीतर है?”
गंगाराम ने अचानक उसका हाथ पकड़ लिया।
उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन काँप रही थी—
“चुप…
कुछ बातें गाँव के बीच नहीं कही जातीं।”
भीड़ सन्न रह गई।
गंगाराम ने चारों ओर देखा—
हर चेहरा जैसे कुछ छुपा रहा हो।
हर आँख में बीते वर्षों का बोझ तैर रहा था।
तभी उसे समझ आया—
सच सुरंग में नहीं था।
सच तो यहीं था…
इन चेहरों के बीच,
इन खामोशियों में दबा हुआ।
पहला नाम — दुलारीन साह
गाँव की सबसे बुज़ुर्ग औरत—दुलारीन साह।
जो हर दुख में यही कहा करती थी—
“सब ठीक हो जाएगा, बेटा।”
लेकिन जैसे ही सुरंग और काली रातों की बात चली,
वह अचानक घुटनों के बल बैठ गई।
उसके हाथ काँपने लगे।
“गंगा…”
उसकी आवाज़ भर्रा गई,
“उस कांड का नाम मत लो…
उस समय हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई थी।”
राशिराम चौंक पड़ा—
“काकी! कैसी गलती?”
दुलारीन की आँखें भर आईं—
“चुन्नी की चीखें सुन रही थी…
लेकिन बाहर नहीं निकली।
डरती थी—
अगर दरवाज़ा खोला,
तो मेरा भी वही हाल होगा।”
भीड़ में सन्नाटा फैल गया।
कुछ लोग नज़रें झुकाने लगे।
गंगाराम ने नरमी से पूछा—
“उसे मारा किसने था, काकी?”
दुलारीन ने ज़मीन की ओर देखा—
“वही…
दो ऊँचे परिवारों के लोग,
जिनका नाम आज भी कोई ज़ुबान पर नहीं लाता।”
गाँव में बेचैनी फैल गई।
कुछ लोग उसे चुप कराने लगे।
गंगाराम ने उन्हें रोक दिया—
“सच किसी की इज़्ज़त से नहीं डरता।”
दूसरा नाम — बिरजू ठाकुर
भीड़ से एक दुबला-पतला आदमी आगे आया।
नज़रें हमेशा ज़मीन पर गड़ी रहती थीं
बिरजू ठाकुर।
“गंगा…”
उसकी आवाज़ कच्ची और टूटी हुई थी,
“मैंने उस रात आग लगते देखा था…”
लोग फुसफुसाने लगे—
“अरे, ये तो तब बच्चा था!”
“इसे क्या याद होगा?”
गंगाराम ने शांत स्वर में कहा—
“बच्चों को सबसे ज़्यादा याद रहता है,
क्योंकि उनके झूठ पर बोझ नहीं होता।”
बिरजू काँपते हुए बोला—
“मैंने दो परछाइयाँ देखी थीं।
एक के हाथ में मिट्टी का तेल था,
दूसरे के हाथ में लाठी।”
“चेहरे पहचाने?”
गंगाराम ने पूछा।
बिरजू ने सिर हिला दिया—
“नहीं… पर उनके कपड़ों पर बना खास निशान आज भी याद है।”
एक नाम उसके होंठों तक आया—
लेकिन तभी भीड़ से किसी ने
उसे ज़ोर से धक्का दे दिया—
“चुप! कुछ बातें भूल जानी चाहिए!”
गंगाराम आगे बढ़ा और उस आदमी को रोक लिया—तू डर किससे रहा है?
सच का नाम लेने से कौन डरता है?”
आदमी लाल पड़ गया,
लेकिन चुप रहा।
तीसरा चेहरा — माली चाचा की आँखें
गाँव के माली चाचा—कम बोलते थे,
पर उनकी आँखें
किसी पुराने अपराध की गवाही देती थीं। गंगाराम ने उनकी ओर देखा चाचा…आप उस रात वहाँ थे?”
माली के सूखे होंठ हिले—
“मैंने किसी को भागते नहीं देखा…
किसी को चीखते नहीं देखा…
मैंने तो बस
अगली सुबह राख देखी थी।”
लोगों की साँसें अटक गईं।
“और उस राख में…”
माली चाचा की आवाज़ टूट गई,
“एक बच्ची की गुड़िया थी।”
गंगाराम फुसफुसाया—“तो चुन्नी अकेली नहीं थी?”
माली चाचा की आँखों से आँसू बह निकले—“नहीं…
उसके साथ कोई और भी था।”
गाँव की बदलती हवा
गंगाराम ने महसूस किया—पहाड़ी की सुरंग से निकला अँधेरा अब गाँव की दीवारों में भी फैलने लगा था। चेहरों पर छिपा इतिहास अब खुद सामने आने लगा था।तभी पहाड़ी की दिशा से तीसरी कराह उठी—सबसे लंबी,
सबसे दर्दनाक। इस बार उसमें
सिर्फ़ पीड़ा नहीं, ग़ुस्सा भी था।
लोग घबराकर घरों की ओर भागने लगे। बच्चे रोने लगे। बूढ़ों के हाथ काँपने लगे। गंगाराम ने आसमान की ओर देखा अब परछाइयाँ
सिर्फ़ दिखेंगी नहीं नाम भी माँगेंगी।”
राशिराम ने डरते हुए पूछा—“गंगा… अब का होगा?”
गंगाराम ने धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा—अब गाँव का असली अतीत
अपनी कब्र से बाहर आएगा।
और जिन नामों ने उस रात को जन्म दिया था—उनकी नींद अब टूटेगी।”
उसका वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था
कि गाँव के सबसे पुराने,
सबसे सुनसान मकान का दरवाज़ा
अचानक ज़ोरदार धमाके से
अपने आप खुल गया।
रात ने
जैसे पहला नाम पुकार लिया था।

आर एस लॉस्टम

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