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इस रिश्ते को क्या नाम दूं??


मौसम सुहाना था,पल भी अच्छा था,वक्त भी अनुकूल था मन मे भी सुकुन था,खुशीया चेहरे मे था,मायुसी तो कुछ नही था,सुनसान जगह था,कमरे मे एक दुजे ही थे,कुछ सवाल मन मे मेरे थे,उसके भी मन मा थे,खामोश दोनो ही थे,न वो कुछ कह रहे थे,न मै कुछ कह पा रहा था,भय मन मे कुछ था,कि कुछ गलत न हो जाय,वर्षो से एक साथ थे,हरेक जरूरतों को पूरी करते थे,न गिला,न शिकवा था,बस खामोशी से सबके नजरों से चुराते हुए, जिंदगी की सफर मे चल रहे थे,बेझिझक बिना कुछ नाम दिये इस रिश्ते को,,और एक दिन मन मे कुछ ऐसा ही सवाल आ गया कि
इस रिश्ते को क्या नाम दूँ?
जो अनचाहे मे ही एक दुसरे के साथ हूँ
और वो दिन बस,इसी बात को मन मे दबायें
खामोश सा ,कमरे मे था
कि,,
आज नाम तो अब कुछ देना ही पड़ेगा
अब न रह सकता हूँ, बिना नाम का,,
कर्तव्य की सारी सीमाओं को तो सुरक्षित तरीके से
सजा कर ही रखा हूं उससे
यही सोचते सोचते
अचानक होठ कंपकपाते हुए मेरे ही खुले
और कह दिये कि,,,,जानू
इस रिश्ते को क्या नाम दूँ??
जो तेरे मेरे बीच मे है वर्षो से
मै तो अब थक सा गया हूँ, जिंदगी से
कि
किस किस को क्या जवाब देता रहूँ?
अब विराम सा लगा देता हूँ, इस रिश्ते को यही
बाते पूरी होने से पहले ही,उसने भी
शायद मन को मेरा,पढ़ ली थी
और गले लगते हुए, बस इतना ही कह दी
कि
जो तेरा जी चाहे,वो ही नाम दे
मुझे तो सब स्वीकार है
अब मै भी चाहता हूँ कि,इस रिश्ते को एक नया नाम मिल जाये
जहाँ मै भी न किसी की रखैल कहलाओ और न तु रखैल की आशिक
,रूआसी गलेसे बोली
फिर क्या था,,,
वो ही सन्नाटा कमरा,
बना गवाह हमारा
चुटकी भर सिन्दुर से माँग उसका मैने भर दिया
और पति-पत्नी का रिश्ता बन गया
समाज का,परिवार का कुटुम्ब जनो के सामने
खुद को उसके साथ खड़ा कर लिया मैने
इस रिश्ते को एक नाम मिल गया
चलो अच्छा हुआ कि पति-पत्नी बन गया
हंसते हुए वो दोनो मिले जब हमसे
तो कहा ऐसे
कहो चुन्नू कवि कैसे लगे हमारे किससे?
आशीर्वाद दिया मैने भी ,सदैव खुश रहो,अब से

चुन्नू साहा पाकूड झारखण्ड

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